EPISODE · Jul 27, 2023 · 5 MIN
Mit Gaye Maidanon Wala Gaon | Gyanendrapati
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
मिट गये मैदानोंवाला गाँव - ज्ञानेन्द्रपतिमिट गये मैदानों वाला गाँवक़स्बे की पान-रँगी मुस्कान मुस्काता जै राम जी की कहता हैडूबती तरैयाँ और डूबती बिरियाँ निकलता था जो दिशा-मैदान के लिएऔर अब जिसकी किसी भी दिशा में मैदान नहींगाँव ने मैदान मार लिया है।शहर बनने की राह मेंअपना मैदान मार दिया हैचौराहे की गुमटियों में मटियाली बीड़ियों के मुट्ठेसफ़ेद सिगरेटों के रंगीन पैकिटों में बदल गये हैंसड़क के दोनों तरफ प्रायः पक्के मकानशेष जो हैं वे भी कच्चे नहीं, अधपके हैंबचपन के दोस्तअसमय अधेड़सुखी सफल गंजेउनकी आँखों में झाँकता हूँआँखों उठाता हूँ उनके मन का बन्द शटरगाँव का मिट गया मैदान वहाँ मिल जाये अँजुरी-भर जल-साबचपन के गाँव का ही नहीं, गाँव के बचपन का मैदानगेंद के केन्द्रबिन्दु वालाजो पहली बार छिनाजब खुला वहाँ ब्लॉक-ऑफिस बने कर्मचारियों के आवासकोने में जहाँ एक पाकड़ था पुराना, वहीं ट्रेजरीकिसी ट्रैजिडी के पहले दृश्य-सा-उत्सव की गहमागहमीवालासिरहाने का मैदान गँवाकर ताका गोड़तारी गाँव नेनीचे, दूरवह जो डँगाल थाअधरात जिसे पंजों खूंदते फेकरते थे सियारआते थे जब गाँव के कुत्तों को कोसने जुड़ते थे जहाँ हम बस बरस में एक बारगाँव-भर की होलिका जलानेलिये हरियर चने का मुट्ठा, भूँजने को अपना होरहा चरवाहे बच्चों की गुहारें ही जब-तब जिसका आकाश पक्षियों के साथ करती थीं पारखुला फैला वह ढलवाँ डँगालबना हमारा मैदानसंझा काजब हमारी उछलती गेंद से नीचे होता था सूरजढलते सूरज को भी जब हम गेंद की तरह उछाल देना चाहते थे ऊपर हमारी गेंद को गुम कर, गाँव की लालटेनों को साँवली उँगलियों जलानेवाली गोधूलि को उतरने न देना चाहते थे किताब के और रात के पन्नों को खोलनेछिन गया वह मैदान भी कब का कस्बे की आहटों और कसमसाहटों नेएकाएक नहीं, धीरे-धीरेभरा उसका धरती आकाशऔर अबयहाँ के बच्चों के लिएमैदान बचा हैटेलीविज़न के पर्दे-भरबस उनके नेत्रगोलकों-भरमिट गये मैदानोंवाला यह गाँवनगर में भी तोरूमाल-भर पार्कों और गोलाम्बरों और खेलनिया न भी तो घुमनिया मैदानोंवाले नगर में भी तोनहीं बदलेगा कभीअधिक-से-अधिक विकसेगा वैसे कस्बे मेंजहाँ गली-गली खुलनेवाले मैदानहीन स्कूलों के आँगन मेंखौलते जल की तरह खलबलाते हैं बच्चेखेल की घण्टी मेंबस रविवार की सड़कों पर बनती उनकी पिचरह-रह पहियों से पिचनेवालीस्मृतिशेष मैदानोंवाला यह गाँवअपने मैदानों को गँवा बैठेगा अन्तिम बार जब हम गुज़रेंगे मैं और मेरे दोस्तअपना शिथिल शीश लिये फैला है जिनके मन की सबसे निचली तह में सूख गये तालाब की पाँक-सा मुलायम मैदानदूब और धूप-भरा।
What this episode covers
मिट गये मैदानोंवाला गाँव - ज्ञानेन्द्रपतिमिट गये मैदानों वाला गाँवक़स्बे की पान-रँगी मुस्कान मुस्काता जै राम जी की कहता हैडूबती तरैयाँ और डूबती बिरियाँ निकलता था जो दिशा-मैदान के लिएऔर अब जिसकी किसी भी दिशा में मैदान नहींगाँव ने मैदान मार लिया है।शहर बनने की राह मेंअपना मैदान मार दिया हैचौराहे की गुमटियों में मटियाली बीड़ियों के मुट्ठेसफ़ेद सिगरेटों के रंगीन पैकिटों में बदल गये हैंसड़क के दोनों तरफ प्रायः पक्के मकानशेष जो हैं वे भी कच्चे नहीं, अधपके हैंबचपन के दोस्तअसमय अधेड़सुखी सफल गंजेउनकी आँखों में झाँकता हूँआँखों उठाता हूँ उनके मन का बन्द शटरगाँव का मिट गया मैदान वहाँ मिल जाये अँजुरी-भर जल-साबचपन के गाँव का ही नहीं, गाँव के बचपन का मैदानगेंद के केन्द्रबिन्दु वालाजो पहली बार छिनाजब खुला वहाँ ब्लॉक-ऑफिस बने कर्मचारियों के आवासकोने में जहाँ एक पाकड़ था पुराना, वहीं ट्रेजरीकिसी ट्रैजिडी के पहले दृश्य-सा-उत्सव की गहमागहमीवालासिरहाने का मैदान गँवाकर ताका गोड़तारी गाँव नेनीचे, दूरवह जो डँगाल थाअधरात जिसे पंजों खूंदते फेकरते थे सियारआते थे जब गाँव के कुत्तों को कोसने जुड़ते थे जहाँ हम बस बरस में एक बारगाँव-भर की होलिका जलानेलिये हरियर चने का मुट्ठा, भूँजने को अपना होरहा चरवाहे बच्चों की गुहारें ही जब-तब जिसका आकाश पक्षियों के साथ करती थीं पारखुला फैला वह ढलवाँ डँगालबना हमारा मैदानसंझा काजब हमारी उछलती गेंद से नीचे होता था सूरजढलते सूरज को भी जब हम गेंद की तरह उछाल देना चाहते थे ऊपर हमारी गेंद को गुम कर, गाँव की लालटेनों को साँवली उँगलियों जलानेवाली गोधूलि को उतरने न देना चाहते थे किताब के और रात के पन्नों को खोलनेछिन गया वह मैदान भी कब का कस्बे की आहटों और कसमसाहटों नेएकाएक नहीं, धीरे-धीरेभरा उसका धरती आकाशऔर अबयहाँ के बच्चों के लिएमैदान बचा हैटेलीविज़न के पर्दे-भरबस उनके नेत्रगोलकों-भरमिट गये मैदानोंवाला यह गाँवनगर में भी तोरूमाल-भर पार्कों और गोलाम्बरों और खेलनिया न भी तो घुमनिया मैदानोंवाले नगर में भी तोनहीं बदलेगा कभीअधिक-से-अधिक विकसेगा वैसे कस्बे मेंजहाँ गली-गली खुलनेवाले मैदानहीन स्कूलों के आँगन मेंखौलते जल की तरह खलबलाते हैं बच्चेखेल की घण्टी मेंबस रविवार की सड़कों पर बनती उनकी पिचरह-रह पहियों से पिचनेवालीस्मृतिशेष मैदानोंवाला यह गाँवअपने मैदानों को गँवा बैठेगा अन्तिम बार जब हम गुज़रेंगे मैं और मेरे दोस्तअपना शिथिल शीश लिये फैला है जिनके मन की सबसे निचली तह में सूख गये तालाब की पाँक-सा मुलायम मैदानदूब और धूप-भरा।
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