EPISODE · Jan 2, 2024 · 1 MIN
Nadi Aur Sabun | Gyanendrapati
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
नदी और साबुन | ज्ञानेन्द्रपति नदी!तू इतनी दुबली क्यों हैऔर मैली-कुचैलीमारी हुई इच्छाओं की तरह मछलियाँ क्यों उतारे हैंतुम्हारे दुर्दिनों के दुर्जल मेंकिसने तुम्हारा नीर हराकलकल में कलुष भराबाघों के जुठारने से तोकभी दूषित नहीं हुआ तुम्हारा जलन कछुओं की दृढ़ पीठों से उलीचा जाकर भी कम हुआहाथियों की जल-क्रीड़ाओं को भी तुम सहती रहीं सानंदआह! लेकिनस्वार्थी कारख़ानों का तेज़ाबी पेशाब झेलतेबैंगनी हो गई तुम्हारी शुभ्र त्वचाहिमालय के होते भी तुम्हारे सिरहानेहथेली-भर की एक साबुन की टिकिया सेहार गईं तुम युद्ध!
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नदी और साबुन | ज्ञानेन्द्रपति नदी!तू इतनी दुबली क्यों हैऔर मैली-कुचैलीमारी हुई इच्छाओं की तरह मछलियाँ क्यों उतारे हैंतुम्हारे दुर्दिनों के दुर्जल मेंकिसने तुम्हारा नीर हराकलकल में कलुष भराबाघों के जुठारने से तोकभी दूषित नहीं हुआ तुम्हारा जलन कछुओं की दृढ़ पीठों से उलीचा जाकर भी कम हुआहाथियों की जल-क्रीड़ाओं को भी तुम सहती रहीं सानंदआह! लेकिनस्वार्थी कारख़ानों का तेज़ाबी पेशाब झेलतेबैंगनी हो गई तुम्हारी शुभ्र त्वचाहिमालय के होते भी तुम्हारे सिरहानेहथेली-भर की एक साबुन की टिकिया सेहार गईं तुम युद्ध!
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