EPISODE · Feb 23, 2026 · 2 MIN
Neend Uchat Jati Hai | Narendra Sharma
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
नींद उचट जाती है । नरेंद्र शर्माजब-तब नींद उचट जाती हैपर क्या नींद उचट जाने सेरात किसी की कट जाती है?देख-देख दु:स्वप्न भयंकर,चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर;पर भीतर के दु:स्वप्नों सेअधिक भयावह है तम बाहर!आती नहीं उषा, बस केवलआने की आहट आती है!देख अँधेरा नयन दूखते,दुश्चिंता में प्राण सूखते!सन्नाटा गहरा हो जाता,जब-जब श्वान श्रृगाल भूँकते!भीत भावना,भोर सुनहलीनयनों के न लाती है!मन होता है फिर सो जाऊँ,गहरी निद्रा में खो जाऊँ;जब तक रात रहे धरती पर,चेतन से फिर जड़ हो जाऊँउस करवट अकुलाहट थी, परनींद न इस करवट आती है!करवट नहीं बदलता है तम,मन उतावलेपन में अक्षम!जगते अपलक नयन बावले,थिर न पुतलियाँ, निमिष गए थम!साँस आस में अटकी, मन कोआस रात भर भटकाती है!जागृति नहीं अनिद्रा मेरी,नहीं गई भव-निशा अँधेरी!अंधकार केंद्रित धरती पर,देती रही ज्योति चकफेरी!अंतर्नयनों के आगे सेशिला न तम की हट पाती है!
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नींद उचट जाती है । नरेंद्र शर्माजब-तब नींद उचट जाती हैपर क्या नींद उचट जाने सेरात किसी की कट जाती है?देख-देख दु:स्वप्न भयंकर,चौंक-चौंक उठता हूँ डरकर;पर भीतर के दु:स्वप्नों सेअधिक भयावह है तम बाहर!आती नहीं उषा, बस केवलआने की आहट आती है!देख अँधेरा नयन दूखते,दुश्चिंता में प्राण सूखते!सन्नाटा गहरा हो जाता,जब-जब श्वान श्रृगाल भूँकते!भीत भावना,भोर सुनहलीनयनों के न लाती है!मन होता है फिर सो जाऊँ,गहरी निद्रा में खो जाऊँ;जब तक रात रहे धरती पर,चेतन से फिर जड़ हो जाऊँउस करवट अकुलाहट थी, परनींद न इस करवट आती है!करवट नहीं बदलता है तम,मन उतावलेपन में अक्षम!जगते अपलक नयन बावले,थिर न पुतलियाँ, निमिष गए थम!साँस आस में अटकी, मन कोआस रात भर भटकाती है!जागृति नहीं अनिद्रा मेरी,नहीं गई भव-निशा अँधेरी!अंधकार केंद्रित धरती पर,देती रही ज्योति चकफेरी!अंतर्नयनों के आगे सेशिला न तम की हट पाती है!
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