EPISODE · Apr 21, 2024 · 2 MIN
Patang | Arti Jain
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
पतंग | आरती जैनहम कमरों की कैद से छूटछत पर पनाह लेते हैंजहाँ आज आसमां परदो नन्हे धब्बे एक दूसरे संग नाच रहे हैं"पतंग? यह पतंग का मौसम तो नहीं"नीचे एम्बुलैंस चीरती हैं सड़कों कोलाल आँखें लिए, विलाप करतीअपनी कर्कश थकी आवाज़ मेंदामन फैलायेनिरुत्तर सवाल पूछतीट्रेन में से झांकते हैं बुतों के चेहरेजिनके होठ नहीं पर आंखें बहुत सी हैंजो एकटक घूरतीखोज रही हैं कि दिख जाए कुछखौफ और हिम्मत के धुंधलके में"ऐसा धुआं तो नवंबर में होता है""हाँ, जब पराली जलती है"सन्नाटा जानता है कि ये पराली नहींधुएं की एक लकीरआसमान को घोंपने निकल पड़ी हैजहां दो पतंगें अब भीशरीर बच्चों सीएक दूसरे को चिढ़ा-चिढ़ा करखिलखिला रही हैं,"मौसम तो ये पतंग का भी नहीं"
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Patang | Arti Jain
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