EPISODE · May 23, 2024 · 2 MIN
Phagun Ka Geet | Kedarnath Singh
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
फ़ागुन का गीत | केदारनाथ सिंहगीतों से भरे दिन फागुन के ये गाए जाने को जी करता!ये बाँधे नहीं बँधते, बाँहें रह जातीं खुली की खुली,ये तोले नहीं तुलते, इस परये आँखें तुली की तुली,ये कोयल के बोल उड़ा करते, इन्हें थामे हिया रहता!अनगाए भी ये इतने मीठेइन्हें गाएँ तो क्या गाएँ,ये आते, ठहरते, चले जातेइन्हें पाएँ तो क्या पाएँये टेसू में आग लगा जाते, इन्हें छूने में डर लगता!ये तन से परे ही परे रहते,ये मन में नहीं अँटते,मन इनसे अलग जब हो जाता,ये काटे नहीं कटते,ये आँखों के पाहुन बड़े छलिया, इन्हें देखे न मन भरता!गीतों से भरे दिन फागुन के ये गाए जाने को जी करता!
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फ़ागुन का गीत | केदारनाथ सिंहगीतों से भरे दिन फागुन के ये गाए जाने को जी करता!ये बाँधे नहीं बँधते, बाँहें रह जातीं खुली की खुली,ये तोले नहीं तुलते, इस परये आँखें तुली की तुली,ये कोयल के बोल उड़ा करते, इन्हें थामे हिया रहता!अनगाए भी ये इतने मीठेइन्हें गाएँ तो क्या गाएँ,ये आते, ठहरते, चले जातेइन्हें पाएँ तो क्या पाएँये टेसू में आग लगा जाते, इन्हें छूने में डर लगता!ये तन से परे ही परे रहते,ये मन में नहीं अँटते,मन इनसे अलग जब हो जाता,ये काटे नहीं कटते,ये आँखों के पाहुन बड़े छलिया, इन्हें देखे न मन भरता!गीतों से भरे दिन फागुन के ये गाए जाने को जी करता!
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