Purkhon ka Dukh | Madan Kashyap episode artwork

EPISODE · Dec 17, 2023 · 4 MIN

Purkhon ka Dukh | Madan Kashyap

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

पुरखों का दुःख - मदन कश्यप दादा की एक पेटी पड़ी थी टीन की उसमें ढेर सारे काग़ज़ात के बीच जरी वाली एक टोपी भी थीज़र-ज़मीन के दस्तावेज़बँटवारे की लादाबियाँ...उनकी लिखावट अच्छी थी अपने ज़माने के ख़ासे पढ़े-लिखे थे दादा तभी तो कैथी नहीं नागरी में लिखते थेउनमें कोई भी दस्तावेज़ नहीं था दुख का दादा ने अपनी पीड़ाओं को कहीं भी दर्ज नहीं किया था उनके ऐश्वर्य की कुछ कथाएँ ज़रूर सुनाती थी दादी कि कैसे टोपी पहनकर हाथ में छड़ी लेकर निकलते थे गाँव में दादालेकिन दादी ने कभी नहीं बताया कि भादों में जब झड़ी लगती थी बरसात की और कोठी के पेंदे में केवल कुछ भूसा बचा रह जाता थातब पेट का दोज़ख भरने के लिए अन्न कैसे जुटाते थे दादानदी और चौर-चाँचर से घिरे इस गाँव में अभी मेरे बचपन तक तो घुस आता था गंडक का पानी फिर दादा के बचपन में कैसा रहा होगा यह गाँव कैसी रही होगी यह नदी सदानीरा कभी जिसको पार करने से ही बदल गयी थी संस्कृति सभ्यता ने पा लिया था अपना नया अर्थऔर कुछ भी तो दर्ज नहीं है कहीं फ़क़त कुछ महिमागानों के सिवा हम महान ज्ञात्रिक कुल के वंशज हैं हम ने ही बनाया था वैशाली का जनतंत्र कोई तीन हज़ार वर्षों से बसे हैं हम इस सदानीरा शालिग्रामी नारायणी के तट पर लेकिन यह किसी ने नहीं बताया है कि बाढ़ और वर्षा की दया पर टिकी छोटी जोत की खेती से कैसे गुज़ारा होता था पुरखों का क्या स्त्रियों और बेटियों को मिल पाता था भरपेट खानाबचपन में बीमार रहने वाले मेरे पिता बहुत पढ़-लिख भी नहीं पाये थे वे तो जनम से ही चुप्पा थे हर समय अपने सीने में नफ़रत और प्रतिहिंसा की आग धधकाये रहते थे और जो कभी भभूका उठता थातो पूरा घर झुलस जाता थाउनकी पीड़ा थी कोशी की तरह प्रचंड बेगवतीजिसे भाषा में बाँधने की कभी कोशिश नहीं की उन्होंनेमैंने माँ की आँखों और पिता की चुप्पी मेंमहसूस किया था जिस दुख कोअचानक उसे अपने रक्त में बहते हुए पायाकिसी भी अन्य नदी से ज़्यादा प्राचीन है वेदना की नदीजो समय की दिशा में बहती हैपी़ढी-दर-पी़ढी पुश्त-दर-पुश्त!दुख का कारण और निदान ढूँढ़ने ही तो निकले थे बुद्धवे तो मर-खप ही जाते ढोंगेश्वर की गुफाओं मेंकि उनके दुख को करुणा में बदल दियासुजाता की खीर ने!

पुरखों का दुःख - मदन कश्यप दादा की एक पेटी पड़ी थी टीन की उसमें ढेर सारे काग़ज़ात के बीच जरी वाली एक टोपी भी थीज़र-ज़मीन के दस्तावेज़बँटवारे की लादाबियाँ...उनकी लिखावट अच्छी थी अपने ज़माने के ख़ासे पढ़े-लिखे थे दादा तभी तो कैथी नहीं नागरी में लिखते थेउनमें कोई भी दस्तावेज़ नहीं था दुख का दादा ने अपनी पीड़ाओं को कहीं भी दर्ज नहीं किया था उनके ऐश्वर्य की कुछ कथाएँ ज़रूर सुनाती थी दादी कि कैसे टोपी पहनकर हाथ में छड़ी लेकर निकलते थे गाँव में दादालेकिन दादी ने कभी नहीं बताया कि भादों में जब झड़ी लगती थी बरसात की और कोठी के पेंदे में केवल कुछ भूसा बचा रह जाता थातब पेट का दोज़ख भरने के लिए अन्न कैसे जुटाते थे दादानदी और चौर-चाँचर से घिरे इस गाँव में अभी मेरे बचपन तक तो घुस आता था गंडक का पानी फिर दादा के बचपन में कैसा रहा होगा यह गाँव कैसी रही होगी यह नदी सदानीरा कभी जिसको पार करने से ही बदल गयी थी संस्कृति सभ्यता ने पा लिया था अपना नया अर्थऔर कुछ भी तो दर्ज नहीं है कहीं फ़क़त कुछ महिमागानों के सिवा हम महान ज्ञात्रिक कुल के वंशज हैं हम ने ही बनाया था वैशाली का जनतंत्र कोई तीन हज़ार वर्षों से बसे हैं हम इस सदानीरा शालिग्रामी नारायणी के तट पर लेकिन यह किसी ने नहीं बताया है कि बाढ़ और वर्षा की दया पर टिकी छोटी जोत की खेती से कैसे गुज़ारा होता था पुरखों का क्या स्त्रियों और बेटियों को मिल पाता था भरपेट खानाबचपन में बीमार रहने वाले मेरे पिता बहुत पढ़-लिख भी नहीं पाये थे वे तो जनम से ही चुप्पा थे हर समय अपने सीने में नफ़रत और प्रतिहिंसा की आग धधकाये रहते थे और जो कभी भभूका उठता थातो पूरा घर झुलस जाता थाउनकी पीड़ा थी कोशी की तरह प्रचंड बेगवतीजिसे भाषा में बाँधने की कभी कोशिश नहीं की उन्होंनेमैंने माँ की आँखों और पिता की चुप्पी मेंमहसूस किया था जिस दुख कोअचानक उसे अपने रक्त में बहते हुए पायाकिसी भी अन्य नदी से ज़्यादा प्राचीन है वेदना की नदीजो समय की दिशा में बहती हैपी़ढी-दर-पी़ढी पुश्त-दर-पुश्त!दुख का कारण और निदान ढूँढ़ने ही तो निकले थे बुद्धवे तो मर-खप ही जाते ढोंगेश्वर की गुफाओं मेंकि उनके दुख को करुणा में बदल दियासुजाता की खीर ने!

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This episode is 4 minutes long.

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This episode was published on December 17, 2023.

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पुरखों का दुःख - मदन कश्यप दादा की एक पेटी पड़ी थी टीन की उसमें ढेर सारे काग़ज़ात के बीच जरी वाली एक टोपी भी थीज़र-ज़मीन के दस्तावेज़बँटवारे की लादाबियाँ...उनकी लिखावट अच्छी थी अपने ज़माने के ख़ासे पढ़े-लिखे थे दादा तभी तो कैथी नहीं नागरी में लिखते...

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