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Raakh | Arun Kamal

EPISODE · Oct 14, 2024 · 2 MIN

Raakh | Arun Kamal

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

राख | अरुण कमलशायद यह रुक जातासही साइत पर बोला गया शब्दसही वक्त पर कन्धे पर रखा हाथसही समय किसी मोड़ पर इंतज़ारशायद रुक जाती मौतओफ! बार बार लगता है मैंने जैसे उसे ठीक से पकड़ा नहींगिरा वह छूट कर मेरी गोद सेकिधर था मेरा ध्यान मैं कहाँ थाअचानक आता है अँधेराअचानक घास में फतिंगों की हलचलअचानक कोई फूल झड़ता हैऔर पकने लगता है फलमैंने वे सारे क्षण खो दियेवे अन्तिम साँस के क्षणअपनी साँस उसके होठों में भरने के क्षणभरी थीं सारी टंकियाँ जब वह एक घूँट पानी कोतड़पा इतनी हवा थी चारों ओरउस समय क्या कर रहा था मैंयाद करो तुम क्या कर रहे थे उस वक्तमुझे सोना नहीं था नहींमुझे अपनी पलकें अंकुशों से खींचे रखनी थींमैं चीख तो सकता था मैं रो तो सकता था ज़ोर सेमेरे तलवे काँपते तो भूकम्प सेजिसमें इतनी आग थीउसकी इतनी कम राख!

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Raakh | Arun Kamal

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