EPISODE · Sep 1, 2025 · 2 MIN
Raat ka Ped | Rahi Masoom Raza
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
रात का पेड़ | राही मासूम रज़ारास्तेचाँदनी ओढ़ कर सो गएझील पर नींद की सिलवटें पड़ गईंआहटेंपहले पीली पड़ींऔर फिरएक-एक करके सब झड़ गईंरात का पेड़दस्ते-दुआ बन गयाअपनी ही ज़ात सेअपने ही आपके बीच का फ़ासिला बन गयादर्द का रास्ता बन गयाएक बूढ़ापुर-असरार दरवेशजो सैकड़ों हाथ अपने उठाए हुएआसमाँ की तरफ़देखते-देखते थक गयाआसमाँ चुप रहारात के पेड़ के हाथ दुखने लगेफिर वही पेड़वहशत का इक सिलसिला बन गयाक़िस्सा-ए-अहले-दिलक़िस्सा-ए-साहिबाने-वफ़ा बन गयाज़ख़्मों की कोंपलें आ गईंऔर उस पेड़ ने झुक के मुझसे कहा :“सुबह के शौक़ में जागने से बड़ी कोई नेमत नहींअपनी आँखों को तुमसुबह के शौक़ मेंजागने और जगाने की तालीम दो”
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रात का पेड़ | राही मासूम रज़ारास्तेचाँदनी ओढ़ कर सो गएझील पर नींद की सिलवटें पड़ गईंआहटेंपहले पीली पड़ींऔर फिरएक-एक करके सब झड़ गईंरात का पेड़दस्ते-दुआ बन गयाअपनी ही ज़ात सेअपने ही आपके बीच का फ़ासिला बन गयादर्द का रास्ता बन गयाएक बूढ़ापुर-असरार दरवेशजो सैकड़ों हाथ अपने उठाए हुएआसमाँ की तरफ़देखते-देखते थक गयाआसमाँ चुप रहारात के पेड़ के हाथ दुखने लगेफिर वही पेड़वहशत का इक सिलसिला बन गयाक़िस्सा-ए-अहले-दिलक़िस्सा-ए-साहिबाने-वफ़ा बन गयाज़ख़्मों की कोंपलें आ गईंऔर उस पेड़ ने झुक के मुझसे कहा :“सुबह के शौक़ में जागने से बड़ी कोई नेमत नहींअपनी आँखों को तुमसुबह के शौक़ मेंजागने और जगाने की तालीम दो”
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