EPISODE · Jun 29, 2023 · 5 MIN
Rohit Vemula Par Paanch Kavitayein | Priyadarshan
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
रोहित वेमुला पर पाँच कविताएँ / प्रियदर्शन सत्ताईस साल से मौत की तिल-तिल अदा की जा रही किस्तेंउसने एक बार चुकाने का फैसला कियाऔर एक लंबी छलाँग लगाकर चला गयाउस बेहद लंबी अंधी सुरंग के पार जो उसकी जिंदगी थीउसकी लहू-लुहान पीठ पर सदियों से पड़ते कोड़ों के निशान थेउसकी जुबान सिल दी गई थीअपने जख्मी होठों से जिन शब्दों कोवह अपने मुक्ति के मंत्र की तरह बुदबुदाना चाहता थाउन्हें व्यर्थ बना दिया गया थाउसे दंडित किया गया क्योंकि उसने ऊपर उठने की कोशिश कीवह रामायण का शंबूक था, रोम का स्पार्टाकसवह उन लाखों लाख गुमनाम गुलामों दासों और शूद्रों की साझा चीख थाजो पीटे गए, मारे गए, सूली पर चढ़ा दिए गएजिनके कानों में सीसा डाला गया, जिनकी आँख निकाल ली गईजिनके शव सड़ने के लिए छोड़ दिए गए सड़कों परवो हमारी आत्मा में चुभता हुआ भारत थाजिसे खत्म किया जाना जरूरी थाइतिहास की ताकतें चुपके से तैयार कर रही थीं उसका फंदाजब वह मारा गया तो बताया गया कि वह एक कायर था, उसने जान दे दी।’ दो–‘उसकी माँ थी, उसके भाई थे, उसके दोस्त थे, उसके सपने थे, उसका कार्ल सागान थाउसके भीतर छटपटाती कविताएँ थींउसके भीतर आकार लेती कुछ विज्ञान कथाएँ थींउसके भीतर उम्मीद थी, उसके भीतर गुस्सा थाउसके भीतर प्रतिरोध की कामना थीलेकिन अपने अंतिम समय में वह बिल्कुल खाली थावह कौन सा ड्रैक्युला था जिसने उसके भीतरउतरकर सोख लिया था उसका पूरा संसार।’ तीन–‘उसने अपने खुदकुशी के लिए सिर्फ खुद कोजिम्मेदार ठहराया किसी और को नहींअब उसके हत्यारे उसका दिया प्रमाण-पत्र दिखाकरसाबित कर रहे हैं कि उन्होंने उसे नहीं मारावह बस अपना जीवन जीना चाहता थालेकिन इतने भर के लिएउसे इतिहास की उन ताकतों से टकराना पड़ाजो थकाकर मार डालने का हुनर जानती थीवे किसी कृपा की तरह वज़ीफ़े बाँटती थींउनके पास बहुत सारा सब्र था, बहुत सारी करुणाजिससे वह अपने भीतर की घृणा को छुपाए रखती थींउस दिन के इंतजार मेंजब कोई रोहित वेमुला हार मानकर छोड़ देगा अपनी और उनकी दुनियावे नहीं चाहती थीं कोई उन्हें आईना दिखाएकोई याद दिलाए उन्हें उनका ओछापन।’चार–‘हमें तो उसका शोक मनाने का हक भी नहींहम तो उसे ठीक से जानते तक नहींहमने कभी उसे देखा तक नहीं कि किस हाल में वह जीता था/किस तरह मरता था, क्यों लड़ता थाजब उसे इंतजार था हमारा तो हम दूर खड़े रहेउसकी आत्मा से बेखबर या बेपरवाहकोई नहीं जानता जिस बैनर से वह ताकत हासिल करता थाउसे मौत की रस्सी में बदलने से पहलेउसने कितनी रस्सियाँ थामने की कोशिश की होंगीउस सर्द एहसास तक पहुँचने से पहलेजिसमें कोई उदासी नहीं होतीसिर्फ निचाट अकेलापन होता हैउसने कितनी बार शब्दों की आँच से ऊष्मा चाही होगीजब उसे यह छोटी-सी डोर भी छिनती लगीतो उसने यह रस्सी बनाईऔर चला गया सब कुछ छोड़करजान देकर ही असल में उसने हासिल की वह जिंदगीजिसका वह जीते-जी हकदार था और जो हक हमसे अदा न हुआ।’पाँच–‘लेकिन एक दिन यह कर्ज इतिहास को चुकाना होगाएक दिन एकलव्य लौटेगा अपना रिसता हुआ अँगूठा माँगनेएक दिन रोम स्पार्टाकस का होगाएक दिन शंबूक वाल्मीकि के सामने खड़ा होगापूछेगा आदिकवि सेकिस अपराध में एक महाकाव्य पर उसके खून के छींटे डाले गएअपने खून से जो स्याही तुमने बनाई है रोहित वेमुलाएक दिन वो भी काम आएगी।’
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रोहित वेमुला पर पाँच कविताएँ / प्रियदर्शन सत्ताईस साल से मौत की तिल-तिल अदा की जा रही किस्तेंउसने एक बार चुकाने का फैसला कियाऔर एक लंबी छलाँग लगाकर चला गयाउस बेहद लंबी अंधी सुरंग के पार जो उसकी जिंदगी थीउसकी लहू-लुहान पीठ पर सदियों से पड़ते कोड़ों के निशान थेउसकी जुबान सिल दी गई थीअपने जख्मी होठों से जिन शब्दों कोवह अपने मुक्ति के मंत्र की तरह बुदबुदाना चाहता थाउन्हें व्यर्थ बना दिया गया थाउसे दंडित किया गया क्योंकि उसने ऊपर उठने की कोशिश कीवह रामायण का शंबूक था, रोम का स्पार्टाकसवह उन लाखों लाख गुमनाम गुलामों दासों और शूद्रों की साझा चीख थाजो पीटे गए, मारे गए, सूली पर चढ़ा दिए गएजिनके कानों में सीसा डाला गया, जिनकी आँख निकाल ली गईजिनके शव सड़ने के लिए छोड़ दिए गए सड़कों परवो हमारी आत्मा में चुभता हुआ भारत थाजिसे खत्म किया जाना जरूरी थाइतिहास की ताकतें चुपके से तैयार कर रही थीं उसका फंदाजब वह मारा गया तो बताया गया कि वह एक कायर था, उसने जान दे दी।’ दो–‘उसकी माँ थी, उसके भाई थे, उसके दोस्त थे, उसके सपने थे, उसका कार्ल सागान थाउसके भीतर छटपटाती कविताएँ थींउसके भीतर आकार लेती कुछ विज्ञान कथाएँ थींउसके भीतर उम्मीद थी, उसके भीतर गुस्सा थाउसके भीतर प्रतिरोध की कामना थीलेकिन अपने अंतिम समय में वह बिल्कुल खाली थावह कौन सा ड्रैक्युला था जिसने उसके भीतरउतरकर सोख लिया था उसका पूरा संसार।’ तीन–‘उसने अपने खुदकुशी के लिए सिर्फ खुद कोजिम्मेदार ठहराया किसी और को नहींअब उसके हत्यारे उसका दिया प्रमाण-पत्र दिखाकरसाबित कर रहे हैं कि उन्होंने उसे नहीं मारावह बस अपना जीवन जीना चाहता थालेकिन इतने भर के लिएउसे इतिहास की उन ताकतों से टकराना पड़ाजो थकाकर मार डालने का हुनर जानती थीवे किसी कृपा की तरह वज़ीफ़े बाँटती थींउनके पास बहुत सारा सब्र था, बहुत सारी करुणाजिससे वह अपने भीतर की घृणा को छुपाए रखती थींउस दिन के इंतजार मेंजब कोई रोहित वेमुला हार मानकर छोड़ देगा अपनी और उनकी दुनियावे नहीं चाहती थीं कोई उन्हें आईना दिखाएकोई याद दिलाए उन्हें उनका ओछापन।’चार–‘हमें तो उसका शोक मनाने का हक भी नहींहम तो उसे ठीक से जानते तक नहींहमने कभी उसे देखा तक नहीं कि किस हाल में वह जीता था/किस तरह मरता था, क्यों लड़ता थाजब उसे इंतजार था हमारा तो हम दूर खड़े रहेउसकी आत्मा से बेखबर या बेपरवाहकोई नहीं जानता जिस बैनर से वह ताकत हासिल करता थाउसे मौत की रस्सी में बदलने से पहलेउसने कितनी रस्सियाँ थामने की कोशिश की होंगीउस सर्द एहसास तक पहुँचने से पहलेजिसमें कोई उदासी नहीं होतीसिर्फ निचाट अकेलापन होता हैउसने कितनी बार शब्दों की आँच से ऊष्मा चाही होगीजब उसे यह छोटी-सी डोर भी छिनती लगीतो उसने यह रस्सी बनाईऔर चला गया सब कुछ छोड़करजान देकर ही असल में उसने हासिल की वह जिंदगीजिसका वह जीते-जी हकदार था और जो हक हमसे अदा न हुआ।’पाँच–‘लेकिन एक दिन यह कर्ज इतिहास को चुकाना होगाएक दिन एकलव्य लौटेगा अपना रिसता हुआ अँगूठा माँगनेएक दिन रोम स्पार्टाकस का होगाएक दिन शंबूक वाल्मीकि के सामने खड़ा होगापूछेगा आदिकवि सेकिस अपराध में एक महाकाव्य पर उसके खून के छींटे डाले गएअपने खून से जो स्याही तुमने बनाई है रोहित वेमुलाएक दिन वो भी काम आएगी।’
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