EPISODE · May 7, 2026 · 1 MIN
Roop Naran Ke Tat Par | Rabindranath Tagore | Translation - Hans Kumar Tiwari
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
रूप-नारान के तट पर । रवींद्रनाथ टैगोरअनुवाद : हंसकुमार तिवारीरूप-नारान के तट परजाग उठा मैं।जाना, यह जगत्सपना नहीं है।लहू के अक्षरों में लिखाअपना रूप देखा;प्रत्येक आघातप्रत्येक वेदना मेंअपने को पहचाना।सत्य कठिन हैकठिन को मैंने प्यार किया—वह कभी छलता नहीं।मरने तक के दुःख का तप है यह जीवन -सत्य के दारुण मूल्य को पाने के लिएमृत्यु में सारा ऋण चुका देना।
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रूप-नारान के तट पर । रवींद्रनाथ टैगोरअनुवाद : हंसकुमार तिवारीरूप-नारान के तट परजाग उठा मैं।जाना, यह जगत्सपना नहीं है।लहू के अक्षरों में लिखाअपना रूप देखा;प्रत्येक आघातप्रत्येक वेदना मेंअपने को पहचाना।सत्य कठिन हैकठिन को मैंने प्यार किया—वह कभी छलता नहीं।मरने तक के दुःख का तप है यह जीवन -सत्य के दारुण मूल्य को पाने के लिएमृत्यु में सारा ऋण चुका देना।
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Roop Naran Ke Tat Par | Rabindranath Tagore | Translation - Hans Kumar Tiwari
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