Sukh Ka Dukh | Bhavani Prasad Mishra episode artwork

EPISODE · Jan 2, 2025 · 2 MIN

Sukh Ka Dukh | Bhavani Prasad Mishra

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

सुख का दुख / भवानीप्रसाद मिश्रज़िन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ,बड़े सुख आ जाएँ घर मेंतो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूँ।यहाँ एक बातइससे भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि,बड़े सुखों को देखकरमेरे बच्चे सहम जाते हैं,मैंने बड़ी कोशिश की है उन्हेंसिखा दूँ कि सुख कोई डरने की चीज़ नहीं है।मगर नहींमैंने देखा है कि जब कभीकोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते मेंबाज़ार में या किसी के घर,तो उनकी आँखों में ख़ुशी की झलक तो आई है,किंतु साथ-साथ डर भी आ गया है।बल्कि कहना चाहिये ख़ुशी झलकी है, डर छा गया है,उनका उठना उनका बैठनाकुछ भी स्वाभाविक नहीं रह पाता,और मुझे इतना दु:ख होता है देख करकि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाता।मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बेटा यह सुख है,इससे डरो मत बल्कि बेफ़िक्री से बढ़ कर इसे छू लो।इस झूले के पेंग निराले हैंबेशक इस पर झूलो,मगर मेरे बच्चे आगे नहीं बढ़तेखड़े खड़े ताकते हैं,अगर कुछ सोचकर मैं उनको उसकी तरफ ढकेलता हूँ।तो चीख मार कर भागते हैं,बड़े बड़े सुखों की इच्छाइसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है,कभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया थाअब मैंने उन्हें फोड़ दी है।

सुख का दुख / भवानीप्रसाद मिश्रज़िन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ,बड़े सुख आ जाएँ घर मेंतो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूँ।यहाँ एक बातइससे भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि,बड़े सुखों को देखकरमेरे बच्चे सहम जाते हैं,मैंने बड़ी कोशिश की है उन्हेंसिखा दूँ कि सुख कोई डरने की चीज़ नहीं है।मगर नहींमैंने देखा है कि जब कभीकोई बड़ा सुख उन्हें मिल गया है रास्ते मेंबाज़ार में या किसी के घर,तो उनकी आँखों में ख़ुशी की झलक तो आई है,किंतु साथ-साथ डर भी आ गया है।बल्कि कहना चाहिये ख़ुशी झलकी है, डर छा गया है,उनका उठना उनका बैठनाकुछ भी स्वाभाविक नहीं रह पाता,और मुझे इतना दु:ख होता है देख करकि मैं उनसे कुछ कह नहीं पाता।मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि बेटा यह सुख है,इससे डरो मत बल्कि बेफ़िक्री से बढ़ कर इसे छू लो।इस झूले के पेंग निराले हैंबेशक इस पर झूलो,मगर मेरे बच्चे आगे नहीं बढ़तेखड़े खड़े ताकते हैं,अगर कुछ सोचकर मैं उनको उसकी तरफ ढकेलता हूँ।तो चीख मार कर भागते हैं,बड़े बड़े सुखों की इच्छाइसीलिये मैंने जाने कब से छोड़ दी है,कभी एक गगरी उन्हें जमा करने के लिये लाया थाअब मैंने उन्हें फोड़ दी है।

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Sukh Ka Dukh | Bhavani Prasad Mishra

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This episode was published on January 2, 2025.

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सुख का दुख / भवानीप्रसाद मिश्रज़िन्दगी में कोई बड़ा सुख नहीं है,इस बात का मुझे बड़ा दु:ख नहीं है,क्योंकि मैं छोटा आदमी हूँ,बड़े सुख आ जाएँ घर मेंतो कोई ऎसा कमरा नहीं है जिसमें उसे टिका दूँ।यहाँ एक बातइससे भी बड़ी दर्दनाक बात यह है कि,बड़े सुखों को...

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