Tram Mein Ek Yaad | Gyanendrapati episode artwork

EPISODE · Jul 22, 2023 · 3 MIN

Tram Mein Ek Yaad | Gyanendrapati

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

ट्राम में एक याद - ज्ञानेन्द्रपति चेतना पारीक कैसी हो?पहले जैसी हो?कुछ-कुछ ख़ुुशकुछ-कुछ उदासकभी देखती तारेकभी देखती घासचेतना पारीक, कैसी दिखती हो?अब भी कविता लिखती हो? तुम्हें मेरी याद तो न होगीलेकिन मुझे तुम नहीं भूली होचलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली होतुम्हारी क़द-काठी की एकनन्ही-सी, नेकसामने आ खड़ी हैतुम्हारी याद उमड़ी है चेतना पारीक, कैसी हो?पहले जैसी हो?आँखों में अब भी उतरती है किताब की आग?नाटक में अब भी लेती हो भाग?छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर?मुझ-से घुमन्तूू कवि से होती है टक्कर?अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?अब भी तुम्हारे हैं बहुत-बहुत मित्र?अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो?चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं सी गेंद-सी उल्लास से भरी हो?उतनी ही हरी हो? उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम हैभीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम हैट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम हैविकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली हैएक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली हैमहानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम हैविराट धक-धक में एक धड़कन कम है कोरस में एक कण्ठ कम हैतुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ााली हैवहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ कर देखता हूँआदमियों को किताबों को निरखता लिखता हूँरंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग बिरंगे लोगरोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोगदेखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी हैदेखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो?बोलो, बोलो, पहले जैसी हो?

ट्राम में एक याद - ज्ञानेन्द्रपति चेतना पारीक कैसी हो?पहले जैसी हो?कुछ-कुछ ख़ुुशकुछ-कुछ उदासकभी देखती तारेकभी देखती घासचेतना पारीक, कैसी दिखती हो?अब भी कविता लिखती हो? तुम्हें मेरी याद तो न होगीलेकिन मुझे तुम नहीं भूली होचलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली होतुम्हारी क़द-काठी की एकनन्ही-सी, नेकसामने आ खड़ी हैतुम्हारी याद उमड़ी है चेतना पारीक, कैसी हो?पहले जैसी हो?आँखों में अब भी उतरती है किताब की आग?नाटक में अब भी लेती हो भाग?छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर?मुझ-से घुमन्तूू कवि से होती है टक्कर?अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?अब भी तुम्हारे हैं बहुत-बहुत मित्र?अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो?चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं सी गेंद-सी उल्लास से भरी हो?उतनी ही हरी हो? उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम हैभीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम हैट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम हैविकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली हैएक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली हैमहानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम हैविराट धक-धक में एक धड़कन कम है कोरस में एक कण्ठ कम हैतुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ााली हैवहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ कर देखता हूँआदमियों को किताबों को निरखता लिखता हूँरंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग बिरंगे लोगरोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोगदेखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी हैदेखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो?बोलो, बोलो, पहले जैसी हो?

NOW PLAYING

Tram Mein Ek Yaad | Gyanendrapati

0:00 3:36

No transcript for this episode yet

We transcribe on demand. Request one and we'll notify you when it's ready — usually under 10 minutes.

Frequently Asked Questions

How long is this episode of Pratidin Ek Kavita?

This episode is 3 minutes long.

When was this Pratidin Ek Kavita episode published?

This episode was published on July 22, 2023.

What is this episode about?

ट्राम में एक याद - ज्ञानेन्द्रपति चेतना पारीक कैसी हो?पहले जैसी हो?कुछ-कुछ ख़ुुशकुछ-कुछ उदासकभी देखती तारेकभी देखती घासचेतना पारीक, कैसी दिखती हो?अब भी कविता लिखती हो? तुम्हें मेरी याद तो न होगीलेकिन मुझे तुम नहीं भूली होचलती ट्राम में फिर आँखों के...

Can I download this Pratidin Ek Kavita episode?

Yes, you can download this episode by clicking the download button on the episode player, or subscribe to the podcast in your preferred podcast app for automatic downloads.
URL copied to clipboard!