EPISODE · Sep 28, 2023 · 2 MIN
Ujle Din Zaroor | Viren Dangwal
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
उजले दिन ज़रूर - वीरेन डंगवाल निराला कोआएँगे, उजले दिन ज़रूर आएँगेआतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ़है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुरातीआकाश उगलता अंधकार फिर एक बारसंशय-विदीर्ण आत्मा राम की अकुलातीहोगा वह समर, अभी होगा कुछ और बारतब कहीं मेघ ये छिन्न-भिन्न हो पाएँगे।तहख़ानों से निकले मोटे-मोटे चूहेजो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहेहैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरेंचीं-चीं, चिक्-चिक् की धूम मचाते घूम रहेपर डरो नहीं, चूहे आख़िर चूहे ही हैं,जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पाएँगे।यह रक्तपात, यह मारकाट जो मची हुईलोगों के दिल भरमा देने का ज़रिया हैजो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते मेंलपटें लेता घनघोर आग का दरिया है।सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसीहम याद रखेंगे, पार उसे कर जाएँगे।मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँहर सपने के पीछे सच्चाई होती हैहर दौर कभी तो ख़त्म हुआ ही करता हैहर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है।आए हैं जब हम चलकर इतने लाख वर्षइसके आगे भी तक चलकर ही जाएँगे,आएँगे, उजले दिन ज़रूर आएँगे।
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Ujle Din Zaroor | Viren Dangwal
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