EPISODE · Apr 7, 2023 · 5 MIN
Utni Door Mat Byahna Baba - Nirmala Putul
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
उतनी दूर मत ब्याहना - निर्मला पुतुल निर्मला पुतुल हिंदी और संताली भाषा की बहुचर्चित लेखिका व कवयित्री हैं। उनका काव्य-संसार आदिवासी महिलाओं के मानवाधिकार, लैंगिक भेदभाव, उत्पीड़न और पलायन जैसे ज़रूरी मुद्दों की आवाज़ बना। निर्मला जी एक सोशल एक्टिविस्ट भी हैं और दलित, आदिवासी महिलाओं की शिक्षा एवं जागरुकता हेतु प्रयासरत रही हैं। बाबा!मुझे उतनी दूर मत ब्याहनाजहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिरघर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हेंमत ब्याहना उस देश मेंजहाँ आदमी से ज़्यादाईश्वर बसते होंजंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँवहाँ मत कर आना मेरा लगनवहाँ तो क़तई नहींजहाँ की सड़कों परमन से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटरगाड़ियाँऊँचे-ऊँचे मकान औरबड़ी-बड़ी दुकानेंउस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ताजिस में बड़ा-सा खुला आँगन न होमुर्ग़े की बाँग पर होती नहीं हो जहाँ सुबहऔर शाम पिछवाड़े से जहाँपहाड़ी पर डूबता सूरज न दिखेमत चुनना ऐसा वरजो पोचई और हड़िया में डूबा रहता हो अक्सरकाहिल-निकम्मा होमाहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने मेंऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिरकोई थारी-लोटा तो नहींकि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगीअच्छा-ख़राब होने परजो बात-बात मेंबात करे लाठी-डंडा कीनिकाले तीर-धनुष, कुल्हाड़ीजब चाहे चला जाए बंगाल, असम या कश्मीरऐसा वर नहीं चाहिए हमेंऔर उसके हाथ में मत देना मेरा हाथजिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाएफ़सलें नहीं उगाईं जिन हाथों नेजिन हाथों ने दिया नहीं कभी किसी का साथकिसी का बोझ नहीं उठायाऔर तो और!जो हाथ लिखना नहीं जानता हो ‘ह’ से हाथउसके हाथ मत देना कभी मेरा हाथ!ब्याहना हो तो वहाँ ब्याहनाजहाँ सुबह जाकरशाम तक लौट सको पैदलमैं जो कभी दुख में रोऊँ इस घाटतो उस घाट नदी में स्नान करते तुमसुनकर आ सको मेरा करुण विलापमहुआ की लट औरखजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ संदेश तुम्हारी ख़ातिरउधर से आते-जाते किसी के हाथभेज सकूँ कद्दू-कोहड़ा, खेखसा, बरबट्टीसमय-समय पर गोगो के लिए भीमेला-हाट-बाज़ार आते-जातेमिल सके कोई अपना जोबता सके घर-गाँव का हाल-चालचितकबरी गैया के बियाने की ख़बरदे सके जो कोई उधर से गुज़रतेऐसी जगह मुझे ब्याहना!उस देश में ब्याहनाजहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते होंबकरी और शेरएक घाट पानी पीते हों जहाँवहीं ब्याहना मुझे!उसी के संग ब्याहना जोकबूतर के जोड़े और पंडुक पक्षी की तरहरहे हरदम हाथघर-बाहर खेतों में काम करने से लेकररात सुख-दुख बाँटने तकचुनना वर ऐसाजो बजाता हो बाँसुरी सुरीलीऔर ढोल-माँदल बजाने में हो पारंगतवसंत के दिनों में ला सके जो रोज़मेरे जूड़े के ख़ातिर पलाश के फूलजिससे खाया नहीं जाएमेरे भूखे रहने परउसी से ब्याहना मुझे!
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Utni Door Mat Byahna Baba - Nirmala Putul
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