EPISODE · Dec 21, 2023 · 3 MIN
Vikshipt | Devansh Ekant
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
विक्षिप्त | देवांश एकांत उनके पैदा होते हीआदमी-औरत से माँ-पिता बने युगल कीकामनाओं को ज्वर आ गयामेडिकल जाँच में ख़ारिज हुई उनकी परिपक्वताऔर मुक्त कर दिया गया उन्हें आकांक्षाओं सेजैसे बहा दी गयीं हों अस्थियाँ गंगा मेंधीरे से उन्हें पागल कहा गयाऔर तेज़ी से यह शब्द उनकी देह पररोया बन उगने लगाउनमें से कुछ को हँसने का रोग थावे ईश्वर का चुटकुला कहलायेकुछ को दृश्यों के पीछे प्रेत दिखेवे किसी तांत्रिक का परीक्षण बनेवे ताउम्र हँसते रहे, रोते रहेयंत्रणाओं का शिकार होते रहेअपनी देह के निशानों पररात-रात भर चकित रहेकमरों के अंधेरों मेंउजाले को टोहते रहेइलेक्ट्रिक शॉकहाई डोज़ की दवाइयों सेउनकी ऐंठी उँगलियों को देखउनकी माताओं की आँखों मेंमृत सपनों की काई जमा हो गयीजिसपर एक पिता फिसलकर गिरता रहाख़ुद को सम्भालते हुएअक्सर मज़ाक़ मेंउनकी खोपड़ी पर मारी गयी टीपभाग्य द्वारा चलायी गयी लाठी हैउन्हें उपेक्षित करके निकल जानाउनकी बेसर-पैर बातों पर ऊब उठनाफूलों की हत्या हैउनका हवाओं से बातें करनाऔर उसपर किसी का दया दिखानाघट रही कला को महसूस न कर पाने की असमर्थता हैमत बुलाना उन्हें पागलमैं कहता हूँ कभी मत बुलाना !किसी दूसरी दुनिया के संपर्क में डूबते उतरातेजाने कौनसी संरचना में फँसे हैं वोउनके संग हँसनाउनपर मत हँसनाउनकी विषमताओं को समझनाखुद विषम मत बननाउनकी काँपती हथेलियों से बने चित्र मेंकोई पूर्णता ढूँढने से अधिकजीवन में किए गए प्रयासों कीआवश्यक स्थिरता को तलाशनाऔर समझ जाना किचंद्रमा पर जो दाग़ हैवह उनकी पेंसिल से घिसा ग्रैफ़ाइट हैबग़ैर जिसके उस उपग्रह के छाया चित्र मेंछाया सम्भव नही ।
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