EPISODE · Jun 24, 2023 · 5 MIN
Yeh Bhi Prem Kavitayein | Priyadarshan
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
यह भी प्रेम कविताएँ / प्रियदर्शन ‘ये भी प्रेम कविताएँ’ एक–‘प्रेम को लेकर इतनी सारी धारणाएँ चल पड़ी हैंकि ये समझना मुश्किल हो गया है कि प्रेम क्या हैएक धारणा कहती है, सबसे करो प्रेमदूसरी धारणा बोलती है, बस किसी एक से करो प्रेमतीसरी धारणा मानती है, प्रेम किया नहीं जाता हो जाता हैएक चौथी धारणा भी है, पहला प्रेम हमेशा बना रहता हैबशर्ते याद रह जाए कि कौन-सा पहला था या प्रेम थापाँचवीं धारणा है, प्रेम-व्रेम सब बकवास है, नजरों का धोखा हैअब वो शख्स क्या करे जिसे इतनी सारी धारणाएँ मिल जाएँऔर प्रेम न मिले या मिले तो प्रेम को पहचान न पाएया जिसे प्रेम माने, वह प्रेम जैसा हो, लेकिन प्रेम न निकलेक्या वाकई जो प्रेम करते हैं वे प्रेम कविताएँ पढ़ते हैंया प्रेम सिर्फ उनकी कल्पनाओं में होता हैलेकिन कल्पनाओं में ही हो तो क्या बुरा हैआखिर कल्पनाओं से ही तो बनती है हमारी जिंदगीशायद ठोस कुछ कम होती हो, मगर सुंदर कुछ ज्यादा होती हैऔर इसमें यह सुविधा होती है कि आप अपने दुनिया को, अपने प्रेम कोमनचाहे ढंग से बार-बार रचें, सिरजें और नया कर देंहममें से बहुत सारे लोग जीवन भर कल्पनाओं में ही प्रेम करते रहेऔर शायद खुश रहे कि इस काल्पनिक प्रेम ने भी किया उनका जीवन समृद्ध।दूसरा–‘जो न ठीक से प्रेम कर पाए न क्रांतिवे प्रेम और क्रांति को एक तराजू पर तौलते रहेबताते रहे कि प्रेम भी क्रांति है और क्रांति भी प्रेम हैकुछ तो ये भरमाते रहे कि क्रांति ही उनका पहला और अंतिम प्रेम हैकविता को भी अंतिम प्रेम बताने वाले दिखेप्रेम के नाम पर शख्सियतें भी कई याद आती रहींमजनूँ जैसे दीवाने और लैला जैसी दु:साहसी लड़कियाँऔर इन दोनों से बहुत दूर खड़ा और शायद बेखबर भीअपना कबीर जो कभी राम के प्रेम में डूबा मिलाऔर कभी सिर काटकर प्रेम हासिल करने की तजवीज़ बताता रहान जाने कितनी प्रेम कविताएँ लिखी गईंन जाने कितने प्रेमी नायक खड़े हुएन जाने कितने फिल्मों में कितनी-कितनी बारकितनी-कितनी तरह से कल्पनाओं केसैकड़ों इंद्रधनुषी रंग लेकर रचा जाता रहा प्रेमलेकिन जिन्होंने किया उन्होंने भी पाया/परेम का इतना पसरा हुआ रायता किसी काम नहीं आयाजब हुआ, हर बार बिल्कुल नया-सा लगाजिसकी कोई मिसाल कहीं हो ही नहीं सकती थीजिसमें छुआ-अनछुआ जो कुछ हुआ, पहली बार हुआ।तीसरा–‘वे जो घरों को छोड़कर, दीवारों को फलाँग करजातियों और खाप को अँगूठा दिखाकरएक दिन भाग खड़े होते हैंवे शायद अपने सबसे सुंदर और जोखिम भरे दिनों मेंछुपते-छुपाते कर रहे होते हैंअपनी जिंदगी का सबसे गहरा प्रेमवे बसों, ट्रेनों, होटलों और शहरों को अदलते-बदलतेइस उम्मीद के भरोसे दौड़ते चले जाते हैंकि एक दिन दुनिया उन्हें समझेगी, उनके प्रेम को स्वीकार कर लेगीये हमारे लैला-मजनूँ, ये हमारे शीरीं-फ़रहाद, ये हमारे रोमियो-जूलियटनहीं जानते कि वे सिर्फ प्रेम नहीं कर रहेएक सहमी हुई दुनिया कोउसकी दीवारों का खोखलापन भी दिखा रहे होते हैंवे नहीं समझते कि उन दो लोगों का प्रेमकैसे उस समाज के लिए खतरा हैजिसकी बुनियाद में प्रेम नहीं घृणा हैबराबरी नहीं दबदबा है, साझा नहीं बँटवारा हैवे तो बस कर रहे होते हैं प्रेमजिसे अपने ही सड़ाँध से बजबजाती और दरकती हुईएक दुनिया डरी-डरी देखती हैऔर जल्द से जल्द इसे मिटा देना चाहती है।’
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यह भी प्रेम कविताएँ / प्रियदर्शन ‘ये भी प्रेम कविताएँ’ एक–‘प्रेम को लेकर इतनी सारी धारणाएँ चल पड़ी हैंकि ये समझना मुश्किल हो गया है कि प्रेम क्या हैएक धारणा कहती है, सबसे करो प्रेमदूसरी धारणा बोलती है, बस किसी एक से करो प्रेमतीसरी धारणा मानती है, प्रेम किया नहीं जाता हो जाता हैएक चौथी धारणा भी है, पहला प्रेम हमेशा बना रहता हैबशर्ते याद रह जाए कि कौन-सा पहला था या प्रेम थापाँचवीं धारणा है, प्रेम-व्रेम सब बकवास है, नजरों का धोखा हैअब वो शख्स क्या करे जिसे इतनी सारी धारणाएँ मिल जाएँऔर प्रेम न मिले या मिले तो प्रेम को पहचान न पाएया जिसे प्रेम माने, वह प्रेम जैसा हो, लेकिन प्रेम न निकलेक्या वाकई जो प्रेम करते हैं वे प्रेम कविताएँ पढ़ते हैंया प्रेम सिर्फ उनकी कल्पनाओं में होता हैलेकिन कल्पनाओं में ही हो तो क्या बुरा हैआखिर कल्पनाओं से ही तो बनती है हमारी जिंदगीशायद ठोस कुछ कम होती हो, मगर सुंदर कुछ ज्यादा होती हैऔर इसमें यह सुविधा होती है कि आप अपने दुनिया को, अपने प्रेम कोमनचाहे ढंग से बार-बार रचें, सिरजें और नया कर देंहममें से बहुत सारे लोग जीवन भर कल्पनाओं में ही प्रेम करते रहेऔर शायद खुश रहे कि इस काल्पनिक प्रेम ने भी किया उनका जीवन समृद्ध।दूसरा–‘जो न ठीक से प्रेम कर पाए न क्रांतिवे प्रेम और क्रांति को एक तराजू पर तौलते रहेबताते रहे कि प्रेम भी क्रांति है और क्रांति भी प्रेम हैकुछ तो ये भरमाते रहे कि क्रांति ही उनका पहला और अंतिम प्रेम हैकविता को भी अंतिम प्रेम बताने वाले दिखेप्रेम के नाम पर शख्सियतें भी कई याद आती रहींमजनूँ जैसे दीवाने और लैला जैसी दु:साहसी लड़कियाँऔर इन दोनों से बहुत दूर खड़ा और शायद बेखबर भीअपना कबीर जो कभी राम के प्रेम में डूबा मिलाऔर कभी सिर काटकर प्रेम हासिल करने की तजवीज़ बताता रहान जाने कितनी प्रेम कविताएँ लिखी गईंन जाने कितने प्रेमी नायक खड़े हुएन जाने कितने फिल्मों में कितनी-कितनी बारकितनी-कितनी तरह से कल्पनाओं केसैकड़ों इंद्रधनुषी रंग लेकर रचा जाता रहा प्रेमलेकिन जिन्होंने किया उन्होंने भी पाया/परेम का इतना पसरा हुआ रायता किसी काम नहीं आयाजब हुआ, हर बार बिल्कुल नया-सा लगाजिसकी कोई मिसाल कहीं हो ही नहीं सकती थीजिसमें छुआ-अनछुआ जो कुछ हुआ, पहली बार हुआ।तीसरा–‘वे जो घरों को छोड़कर, दीवारों को फलाँग करजातियों और खाप को अँगूठा दिखाकरएक दिन भाग खड़े होते हैंवे शायद अपने सबसे सुंदर और जोखिम भरे दिनों मेंछुपते-छुपाते कर रहे होते हैंअपनी जिंदगी का सबसे गहरा प्रेमवे बसों, ट्रेनों, होटलों और शहरों को अदलते-बदलतेइस उम्मीद के भरोसे दौड़ते चले जाते हैंकि एक दिन दुनिया उन्हें समझेगी, उनके प्रेम को स्वीकार कर लेगीये हमारे लैला-मजनूँ, ये हमारे शीरीं-फ़रहाद, ये हमारे रोमियो-जूलियटनहीं जानते कि वे सिर्फ प्रेम नहीं कर रहेएक सहमी हुई दुनिया कोउसकी दीवारों का खोखलापन भी दिखा रहे होते हैंवे नहीं समझते कि उन दो लोगों का प्रेमकैसे उस समाज के लिए खतरा हैजिसकी बुनियाद में प्रेम नहीं घृणा हैबराबरी नहीं दबदबा है, साझा नहीं बँटवारा हैवे तो बस कर रहे होते हैं प्रेमजिसे अपने ही सड़ाँध से बजबजाती और दरकती हुईएक दुनिया डरी-डरी देखती हैऔर जल्द से जल्द इसे मिटा देना चाहती है।’
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Yeh Bhi Prem Kavitayein | Priyadarshan
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