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PODCAST · society

इसे तुम कविता नही कह सकते #ain't Poetry?

by Lokesh Gulyani

Poetic prose by Lokesh Gulyani (हिंदी)

Publisher-supplied feed metadata · PodParley refreshed Oct 9, 2026 · Source feed

Episodes

  1. Episode 61 - रोल कॉल

    उस ख़ूबसूरत चेहरे पर गुज़रे पच्चीस सालों के जुल्मों का नामों निशां नहीं है। ऐसा लग रहा है, जैसे वो चेहरा कभी क्लास छोड़ कर बाहर गया ही नहीं।

  2. Episode 60 - PSPSPSPS

    रोज़ सुबह नहाते हुए मैं अपने बढे हुए पेट की ढलान से नीचे देखने की कोशिश करता हूँ। वहीं देखकर एक मर्द पता लगा सकता है कि उसका पेट कितना बढ़ गया है। पेट बढ़ा है या नहीं, ये पेट तय नहीं करता है।

  3. Episode 59 - विटामिन डी से दोस्ती

    ये बात मुझे सोचने पर मजबूर करती है कि D3 और B12 की कमी से तो देश की लगभग 80% जनता जूझ रही है तो फिर तो हम पीड़ित लोगों का स्वभाव और दिल का हाल तो मिलना चाहिए था ना!

  4. Episode 58 - ज़हनी पचड़ा

    सच कह रहा हूं मैं, अब पाप करने के बारे में भी सोचने लगा हूं, आख़िर कहीं से तो किक और एड्रीनलीन रश मिले। मुझे बचाने की मत सोचो, अपनी फ़िक्र करो।

  5. Episode 57 - तीसरी घंटी

    मुझे तो याद नहीं पड़ता कोई ऐसा क्षण जिसे मैं कह सकूं कि मैं सही समय पर सही जगह खड़ा था। मैं हमेशा ग़लत समय पर एंट्री - एग्जिट लेता रहा।

  6. Episode 56 - कसप

    वो अभी भी राह देख रहा है उसकी कि वो कभी लौट कर आए और उसे कहे कि ' अब तुम भी आगे बढ़ सकते हो, तुम मुझसे मुक्त हुए ' पर अफ़सोस ऐसा हुआ नहीं और ये रिश्ता कसप के डीडी की तरह मारगांठ बनकर उसकी कुंडलिनी में उतर गया और उसके अगले जन्म का प्रारब्ध भी बन गया।

  7. Episode 55 - Nervous Ninetees

    दूर कहीं एक मुसाफ़िर इसी ओर आता दिख रहा है। मैं अंगीठी पर कहवा चढ़ा देता हूं। आज कितने दिनों बाद कोई मेरी ड्यौढ़ी चढ़ेगा। बहुत दिन हो गए मुझे किसी हाड़-मांस के पुतले से बात किए हुए।

  8. Episode 54 - Self-Harm

    पहले लिखना बहुत स्वाभाविक रूप से चलता था, अब डराने लगा है। अब कागज़ के आगे बैठते ही लगता है कि क्या लिखूं जो ये कागज़ अमर हो जाए और यही सोचते-सोचते वो कागज़ एक सस्ती मौत मर जाता है।

  9. Episode 53 - दबाओं ना

    दब कर जीने में फ़ायदा है, ऐसा मुझे सिखाया गया। मेरी सीखने की क्षमता अच्छी थी, मैं अच्छे से सीख गया। मैने औरों को सिखाया वे भी सीख गए। हम सब सीखे-सिखाए लोग हैं।

  10. Episode 52 - मलाल

    कभी-कभी लगता है कि मेरे साथ ज़िंदगी ने ठीक ही बर्ताव किया। अगर मुझे इससे कुछ भी ज़्यादा हासिल हो गया होता तो शायद मैं इस मुगालते में रह जाता कि मैं भी एक काबिल इंसान हूं।

  11. Episode 51 - Ex-Lover

    एक समय के बाद आदमी का मन शराब की कड़वाहट को ही झेल सकता है, प्रेम के प्रेत को नहीं।

  12. Episode 50 - नाभि

    चमत्कार की उम्मीद करना उसके घटने की संभावना को क्षीण ही करता है। So, let the universe do the talking while you gaze at the stars.

  13. Episode 49 - कालपुरुष

    पता नहीं कब और कैसे मैं कालपुरुष के सामने आत्मसमर्पण करता चला गया। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी कालपुरुष ने मुझे डराया हो पर किसी पुरुष ने तो डराया ही होगा। बेड़ा गर्क हो इन यूट्यूब चैनल वालों का।

  14. Episode 48 - मन लुच्चा

    पीने के बाद भी मैं सही सलामत घर लौट आता हूं। इसी से पता चल जाता है कि मैं सही हूं, और डिमेंशिया अभी बहुत दूर की कौड़ी है। और फिर मैने इतनी हॉलीवुड फिल्म्स भी नहीं देखी कि सीधे कैरेक्टर में उतर जाऊं।

  15. Episode 47 - The Anti Social

    कई बार बहुत छोटा लगता है, जब मैं अपना सिर उठा कर आकाश की ओर ताकता हूं। लगता है इतनी बड़ी कायनात में मैं कहां खड़ा हूं? इस बात की कोई महत्ता भी है?

  16. Episode 46 - तुम्हारी खुशी के लिए

    तुम इठला कर मेरी ओर बढ़ती हो। तुम अपनी तारीफ़ सुनना चाहती हो। मैं मुंह फेर लेना चाहता हूं। तुम संगीत धीमा करके मेरे क़रीब आती जा रही हो। मैं पशोपेश में हूं कि क्या करूं कि तुम मेरे क़रीब न आओ। मैं तुम्हारे साथ, अकेला रहना चाहता हूं।

  17. Episode 45 - बिल्कुल चुप

    हिम्मत करके मैं एस्केलेटर पर चढ़ कर मेट्रो स्टेशन के बाहर आता हूं, फिर एक ऑटोरिक्शा को हाथ दिखाता हूं और बहुत धीमी आवाज़ में बोलता हूं CP, वो मुझे बिठाता है, मुंह टेढ़ा करके थूकता है। मुझे बुरा लगता है, लगा जैसे ये मेरे हताश व्यक्तित्व पर गिरी थूक थी।

  18. Episode 44 - Rings of Saturn

    कैसे जान लिया जाता है कि किन्हीं दो लोगों के विचार मिलते हैं। वो exact point कौन सा होता है जब हम convince हो जाते हैं की फ़ला व्यक्ति हमारे जैसा सोचता है। और अगर सोचता है तो उस गर्व किया जाना चाहिए या लज्जित होना चाहिए?

  19. Episode 43 - Comfortably Numb

    अकेले में तुम अपनी हथेलियों को मसलते हो। फोन को घूरते हो। सैकड़ों बार व्हाट्सअप चेक करते हो। पर नहीं, एक ब्लू टिक तक नहीं। उसने तुम्हें त्यागा नहीं है, बस भूलना चाहा है।

  20. Episode 42 - Hero

    ये कहना ग़लत होगा कि मुझे मलाल नहीं है। मलाल हैं और बहुत से हैं पर मैं यकीन से नहीं कह सकता कि दो तरफ़ा मलाल कौन-कौन से रहे। जब मैं किसी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा वो, या जब कोई मेरी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा वो।

  21. Episode 41 - Magic

    टाटा मैजिक की पिछली सीट पर बैठा वो शख़्स कुछ बेसाख्ता बुदबुदाए जा रहा था। अब वो प्रार्थना थी या गाली, मैं कह नहीं सकता। उसकी आँखें वहशत से भरी थी। जो दिन बिताया था उसका डर उन आँखों में दिख रहा था, या आने वाले कल का, कहा नहीं जा सकता।

  22. Episode 40 - You फूल

    भटकना तुम्हारी स्वाभाविक प्रवृति थी, the natural you. इसमें तुम्हें आनंद मिलता था, अब ये कह रहे हैं कि भटकने से तुम्हें रोकेंगे। मैं मन ही मन हंस पड़ता हूं।

  23. Episode 39 - बेवकूफ़ DNA

    मैं लाइटर रगड़ कर चिंगारी निकाल लेता हूं और उससे मानवजाति के पूर्वजों को श्रद्धांजलि देता हूं।

  24. Episode 38 - बस दो मिनट

    कहीं-कहीं किसी दीवार, खिड़की या घर को देखकर ऐसा भी लगता है, जैसे मैं यहां पहले भी आया था। इस खिड़की से मैंने भी कभी बाहर को झांका था, घाटी में आवाज़ दी थी। इस दरवाज़े से बाहर निकलते वक्त, आवारा हवा मेरे भी बालों से टकराई थी। इस दीवार पर थक कर कभी मैंने भी पीठ टिकाई थी।

  25. Episode 37 - सबसे गुस्सा

    पूरे घर में वो एक कोना मय्यसर नहीं की मैं सुकून से बैठ कर कुछ पलों के लिए अपनी आँखें बंद कर सकूं। आँखें बंद करने पर चिंताओं की छाया डोलने लगती है, इसलिए मैं आँखें खुली रखता हूं।

  26. Episode 36 - कर लो दुनियां मुट्ठी में

    मुझे ठीक से याद भी नहीं कि मैंने अपने आपको कमज़ोर मानना कब शुरू किया। कब से मैंने ख़ुद के लिए खड़ा होना छोड़ दिया था।

  27. Episode 35 - पितृ दोष

    उसे भूख लगी है। उसकी मां ने रख छोड़ा है, अखबारी पन्ने में लिपटा ब्रेड पकोड़ा। उस ब्रेड पकोड़े पर नज़र है, सामने वाले घर के छज्जे पर बैठे कव्वे की। कव्वे का मानना है कि यदि वो ये ब्रेड पकोड़ा खा लेगा तो बच्चे का पितृ दोष दूर हो जाएगा।

  28. Episode 34 - मेरी मैं-मैं, मैं जानूं

    मैं जीवन में अर्थ ढूंढते ढूंढते थक गया हूं। अब ऐसी स्थिति आ चुकी है कि ज़िंदगी के मायने ढूंढना और मतलबी होना, एक दूजे के समानांतर लगने लगा है।

  29. Episode 33 - Solo Traveler

    मुझे काफ़ी हद तक ये बात सही लगती है कि जीवन खेद के साथ ख़त्म करने वाली यात्रा तो बिल्कुल नहीं है। अगर गौर से देखा जाए तो आनंद एक अवस्था है, जो भीतर से फूटती है। एक कस्तूरी है खुद में, जिसका हमें संभवतः ज्ञान नहीं।

  30. Episode 32 - लम्बी उड़ान

    मुझे क्या कभी मौका मिलेगा कि मैं अपने हाथ फैला कर नीचे वादियों में कूद जाऊं और मुझे अंजाम की चिंता न हो। नीचे सूरजमुखी के फूलों से भरा मैदान हो, फूल मुझे देखते हुए मुस्कुरा रहे हों। बाहें फैला कर खड़े हों। और मैं उनके ऊपर से उड़ता चला जा रहा हूं, एक बड़ी चील की मानिंद।

  31. Episode 31 - नौकर कहीं का

    मैं समय ख़राब करता हूं, पूरे अधिकार से। मुझे लगता है कि किसी ने मेरा समय ख़रीद कर मुझे ही पकड़ा दिया है, नौकरी की शक्ल में। मालिक बार बार यकीं दिलाता है कि उसने सिर्फ़ समय खरीदा है मुझे नहीं। मैं भी खुद को यह दिलासा देता हूं कि सिर्फ़ समय बिका है, मैं नहीं।

  32. Episode 30 - सायास अनायास

    हम साथ बैठ कर देखी हुई फ़िल्म दुबारा देखते हैं। तुम्हें ठीक-ठीक पता है कि अगले कुछ क्षणों बाद प्रेमी, प्रेमिका का चुम्बन लेगा। तुम अपना हाथ, मेरे हाथ पर रखने का सायास प्रयास, अनायास करती हो। मैं पॉपकॉर्न निकालने के लिए अपनी हथेली को अनायास तुम्हारी हथेली से सायास बाहर को सरकाता हूँ। हम दोनों…

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  33. Episode 29 - Holy Water

    मैं घर पर आकर अपना कोट उतार कर खूंटी पर टांग देता हूं। असल में मैं, ख़ुद ही वहां उस कोट के साथ टंग जाना चाहता हूं पर घर में मेरे लिए इतनी जगह मयस्सर नहीं है।

  34. Episode 28 - मेरे ठेंगे पे (FoMo)

    सुबह उठने के साथ ही यही एक मात्र चिंता कि मैं दिख नहीं रहा, मैं बिक नहीं रहा, FoMo का शिकार मैं, गैलरी खंगाल कर एक पोस्ट का इक़बाल बुलंद करता हूं। मेरे वजूद के लिए चलो कोई तो लड़ रहा है। अब मेरी ओर झांकोगे तो मुझे भी जिंदा पाओगे।

  35. Episode 27 - गिरवी कृतज्ञता

    जब तुम ठुकरा देते हो, एक गोल रोटी को, तो तुम ठुकरा देते हो बहुत से लोगों की मेहनत।

  36. Episode 26 - पहचान मेरी

    मैं गिरता जा रहा हूँ, साल दर साल। झुकी नज़रें, झुकी कमर, एक झुका हुआ इंसान। कोई प्रतिक्रिया देने में इच्छुक नहीं, दुनियां जाए भाड़ में। जीभ पर फैला कड़वापन कुछ भी बोलने से रोकता है। बोलूंगा तो वो तीखा ही होगा।

  37. Episode 25 - हुनर

    जिस दिन मालिक घिसाई को नीलम दे देता, उसे ख़ुद की सुध बुध न रहती, उसकी हालत, देसी दारू के ठेके के बाहर उकडू बैठे, दारुड़ियो सी हो जाती।

  38. Episode 24 - सर्वर डाउन है

    कुछ टिकट मेरे जीवन में धरे के धरे रह गए। उन पर मैने यात्रा नहीं की। कभी–कभी सोचता हूं यदि कर ली होती तो जीवन क्या होता? क्या मैं वही आदमी रहता जो अब हूं?

  39. Episode 23 - कुछ अजीब प्यार है अपना

    कुछ अजीब प्यार है अपना। जो तुम्हारे आते ही ऑटो के मीटर सा डाउन हो जाता है। तुम जल्द चले जाओगे, बस यही सोचता चला जाता है।

  40. Episode 22 - कुछ बातें

    कुछ लड़कों को लड़कियों के घर के अंदर तक आने देना चाहिए ताकि उनके मां बाप भी देख सकें कि दुनियां में अभी भी अच्छे लड़के बचे हैं। कुछ लड़कियों को खुल कर हंसना चाहिए ताकि और लड़कियों को भी पता चले कि जीवन मुस्कुरा कर भी जिया जा सकता है।

  41. Episode 21 - गुलाबी नानसेंस

    एक पुरुष का प्रेम स्त्री के लिए सर्वथा भिन्न होता है। पुरुष प्रेम दर्शाने के लिए अपनी इंद्रियों का इस्तेमाल करता है। वो औरत को छू कर बताता है कि उसे उस औरत से कितना प्रेम है।

  42. Episode 20 - छवि का विचार

    सुनों! तुम कुछ भी कर लेना पर इस छवि को मेरे मन से मत निकलने देना। नहीं मांगता मैं जन्म भर का साथ। न ही तुम पर कोई अधिकार मांगता हूं। जो मांग ही लिया तो फिर प्रेम कैसे हुआ?

  43. Episode 19 - आसान है लिखना

    आप चाहते हैं, वो रोशनी आपको फिर दिखे, मगर आपको कुछ नहीं दिख रहा। भेड़िया भी दिख जाता तो शायद आप बच जाते। मगर वो आपको गुफ़ा में घुसा कर कहीं गुम हो गया है, अब आप क्या करेंगे?

  44. Episode 18 - बत्तख

    कभी - कभी अपने आपको कमज़ोर मान लेना चाहिए। उससे होता ये है कि बहुत बोझ हट जाता है, ख़ुद के कंधों से। हम इस मुगालते में रहते हैं कि सब कुछ हम कर रहे हैं पर बहुत कुछ है जो हमारी नजरों से परे है।

  45. Episode 17 - बाप का ब्रांड

    आज मैं अपने बाप के ब्रांड पर आ गया। एक अलग सा ही नशा मुझ पर छा गया। वो कमरे में उड़ता धुआं, शीशे से पिघलता आब, ग्लास में अपनी शक्ल इख्तियार करता हुआ, उन शामों के कहकहे एक दीवार से उड़कर दूसरी में समाने लगे।

  46. Episode 16 - मेरे घर के बाहर

    हर दस साल बाद, बीते दस साल व्यर्थ लगते हैं। और जब आने के मतलब का खुलासा होता है, समय ख़त्म हो चुका होता है।

  47. Episode 15 - रोटी खाना मना है

    खेल चलते रहना चाहिए, यही एकमात्र नियम है खेल का, ये खेल भूखे पेट का है, भूखी आंखों का है, छोटे अंगिया चोली का है, ये खेल आँखों से आँखें मिला कर मांगने का है, कुछ मिल जाने पर आपस में छीनने का है।

  48. Episode 14 - बत्ती बुझाने से पहले, बत्ती बुझने के बाद

    बत्ती बुझाने से पहले एक बार देख लेना चाहिए। लोग कमरों में हैं या नहीं? दरवाज़े बंद हैं या नहीं? चीज़ें अपनी जगह है या नहीं? दिल धड़क रहे हैं या नहीं? आँखें बंद है, या शून्य में तक रही है। और तक रही है तो क्या ठंडी दीवारों के पार देख पा रही है?

  49. Episode 13 - कमज़ोर मर्द की चिट्ठी

    एक बारह बाय दस का कमरा कितना बड़ा हो सकता है? ये अभी हाल ही में उसे पता लगा। इस कमरे में एक बार घुसने के बाद आदमी गुम हो सकता है। वो घंटों एक जगह बैठा रह सकता है और सैंकड़ों बार जगह भी बदल सकता है।

  50. Episode 12 - ज़िंदगी मौत व्यंग्य

    सारी उम्र जीने को कोसते रहे, किसी किस्मत नाम के कव्वे को बुलाते रहे-भगाते रहे। ऊंची पतंग भी उड़ाते रहे और कटने से भी घबराते रहे।

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