PODCAST · comedy
Vikas
by Vikas Agarwal
कुछ कही kuch ankahiकुछ तुम्हारी,kuch hamari
Episodes
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नए नए दोस्त,नई नई बाते!
कुछ रिश्ते धूल की तरह होते हैं, उनका साफ हो जाना ही अच्छा होता है।
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तुम्हारे ये मेहंदी से भरे हाथ!
तुम्हारे ये मेहंदी से भरे हाथ!
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Today are we fortunate enough?
Are we fortune enough? This debilitating interrogation mark,hounds everyone! Every time when we talk to ourself we confronted this question.. This question is Gist of each conversation with ourself.. It simply means what god has given us. What god given us as a result. What god given us as a…
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हाँ!तुम बहुत खूबसूरत हो! सच मे!
हाँ!तुम बहुत खूबसूरत हो! सच मे!
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तुमसे अच्छी तो तुम्हारी तस्वीर है।
तुमसे अच्छी तो तुम्हारी तस्वीर है।
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कृष्ण बनना कितना सरल...
These lines explains how easy it to become lord krishna☺️😊
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तुमको भूलने का एक अच्छा सा तरीका ढूंढा है मैंने!
तुमको भूलने का एक अच्छा सा तरीका ढूंढा है मैंने!
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तेरी गुड़िया की याद बहुत सताएगी...
These lines explains my love for toys...my daughter's toys...
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तुम...नमक के जैसे
These lines give illustration of my heart, for my beloved importance for me and my life...she is as essential like salt to me😊
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हमारी बेटियाँ.. Daughters..Our Daughters
शब्दों में शायद कभी कोई कुछ न कह पाये, लेकिन मन की गहराइयों में बसती है बेटियाँ।
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कैसे भूलूँ तुमको!
क्यों जगा जाती हो तुम नींदों से, सोया था भुला कर तुमको अच्छे से, मींच कर आँखों को कस कर, की कहीं तुम सपनों से, भीतर न आ जाओ, गर आ भी जाओ तो मुझको न दिख पाओ, यादों को तुम्हारी मैं, समेट कर, जैसे तैसे, अच्छे से बाँध कर, दुछत्ती पर जो रख आया हूँ, किवाड़ भी बंद कर आया हूँ, बोलो फिर, क्यों परेशान करते…
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बताओ तो कैसे भूलें तुम्हे!
नही लिखेँगे तुमको, अब बिल्कुल नही लिखेंगे, नफरत करेंगे तुमसे, अबतो जी भर-भर कर नफरत करेंगे! तुम्हारे नखरों को, अदाओं को, तुम्हारी हर एक नज़र को, नज़रअंदाज़ करेंगे, बिल्कुल भी न देखेंगे तुमको, एक झलक भर भी नही, हुह! न जाने क्या समझते हो खुद को, पर हम तो कुछ नही समझते, मिलेंगे तुम जैसे बहुत, सच मे…
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सवाल...the question?
क्यों डरती है सरकारे आज़ादी से, आज़ादी के नारों से, क्यों बने रहने देना चाहती हैं, हमे किसी का गुलाम, गुलाम, किसी साम्राज्य का, किसी सोच का, किसी समझ या किसी विश्वास का, कभी धर्म के नाम पर, कभी देश के नाम पर, या कभी वायरस के? क्यों आखिर क्यों, क्यों डरती है ये आवाज़ों से, उन आवाज़ों से, जो किसी किताब...
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सच कहना...just be fair...
सच कहना, आज सुबह जब पहली आँख खुली थी, किसे देखा था, कल रात जो आँख लगते लगते किसे देखा था, सच कहना, सच कहना, आज अखबार के पन्ने, पलटते-पलटते, किस शब्द पर, तुम्हारी आँखे रुक जाती है, जिनके आगे, कुछ यादें, पन्नो सी पलट जाती है, सच कहना, सच कहना, आईने के सामने, कुछ तो डर लगता होगा, कभी खुद को, देखा…
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Yes you are beautiful..
कभी शरीर से परे,सुंदरता को महसूस किया है
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