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Abhuwata Samaj | Rupam Mishra

EPISODE · Mar 29, 2024 · 3 MIN

Abhuwata Samaj | Rupam Mishra

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

अभुवाता समाज | रूपम मिश्र वे शीशे-बासे से नहीं हरी कनई मिट्टी से बनी थींजिसमें इतनी नमी थी कि एक सत्ता की चाक पर मनचाहा ढाल दिया जातानाचती हुई एक स्त्री को अचानक कुछ याद आ जाता हैसहम कर खड़ी हो जाती है माथे के पल्‍्लू को और खींच करदर्द को दबा कर एक भरभराई-सी हँसी हँसती हैहमार मालिक बहुत रिसिकट हैंहमरा नाचना उनका नाहीं नीक लगतासाथ पुराती दूसरी स्त्री भी चुप हो जातीये वही आखी-पाखी लड़कियाँ थीं जिनके दुख धरती की तरह थेउसी की तरह नाच कर कुछ पल के लिए खुद को भूल जाना चाहती थींहालाँकि इनके नाचने से बहार नहीं लौटतीऔर बज़ झूरे में बादल भी घुमड़ कर नहीं बरसे कभीये रोतीं तो पवित्र ओस से धरती भीग जातीछनछना कर पैर पटकरतीं तो अड़्हुल कनेर चटक कर खिल जातेपर अब ये डरती हिरनियाँ हैंजो कुलाँचे के लिए तरसती हैंये क्यों डरती हैं, बेहद डरती हैं किसी अपराध से नहीं कभी किसी ब्याह, छठ बरही में डर भूलकर ये नाच उठती हैंबम्बई में बैठा पति खूब गाली देता है डेहरजाई पतुरिया की बेटी है बिना नाचे नहीं रहा जाताफिर भी मोरनियाँ थीं जब भी कोई ननद जेठानी हुलस कर कहतीफलाने बहू बाजे पर तोहार नाच देखे बहुत दिन हो गयाफलाने बहू खुद को रोक नहीं पातीं हाझमक कर नाच उठतींगाँव का कोई मनचला देवर फलाने को फोन करताभौजी बाजे पर गजब नाचती हैं हंस कर कहताफलाने अगिया-बैताल हो जातेलौटने पर नचनिया की बेटी को खूब कूटने का वादा करते'फलानेबहू की बूढ़ी माँ के साथ उनके पिता की जगहखुद के सोने का फरमान जारी करतेसाथ में सात साल की बिटिया को संस्कार देने का आदेश देतेएक अभुआता समाज कायनात की सारी बुलबुलों की गर्दन मरोड़ रहा है...!

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