EPISODE · Mar 4, 2025 · 3 MIN
Adiyal Saans | Kedarnath Singh
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
अड़ियल साँस | केदारनाथ सिंहपृथ्वी बुख़ार में जल रही थीऔर इस महान पृथ्वी केएक छोटे-से सिरे परएक छोटी-सी कोठरी मेंलेटी थी वहऔर उसकी साँसअब भी चल रही थीऔर साँस जब तक चलती हैझूठसचपृथ्वीतारे - सब चलते रहते हैंडॉक्टर वापस जा चुका थाऔर हालाँकि वह वापस जा चुका थापर अब भी सब को उम्मीद थीकि कहीं कुछ है।जो बचा रह गया है नष्ट होने सेजो बचा रह जाता हैलोग उसी को कहते हैं जीवनकई बार उसी कोकाईघासया पत्थर भी कह देते हैं लोगलोग जो भी कहते हैंउसमें कुछ न कुछ जीवनहमेशा होता है।तो यह वही चीज़ थीयानी कि जीवनजिसे तड़पता हुआ छोड़करचला गया था डॉक्टरऔर वह अब भी थीऔर साँस ले रही थी उसी तरहउसकी हर साँसहथौड़े की तरह गिर रही थीसारे सन्नाटे परठक-ठक बज रहा था सन्नाटाजिससे हिल उठता था दियाजो रखा था उसके सिरहानेकिसी ने उसकी देह छुई कहा - 'अभी गर्म है'।लेकिन असल में देह या कि दियाकहाँ से आ रही थी जीने की आँचयह जाँचने का कोई उपाय नहीं थाक्योंकि डॉक्टर जा चुका थाऔर अब खाली चारपाई परसिर्फ़ एक लंबीऔर अकेली साँस थीजो उठ रही थीगिर रही थीगिर रही थीउठ रही थी..इस तरह अड़ियल साँस कोमैंने पहली बार देखामृत्यु से खेलतेऔर पंजा लड़ाते हुएतुच्छअसह्यगरिमामय साँस कोमैंने पहली बार देखाइतने पास से
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Adiyal Saans | Kedarnath Singh
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