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Adrak | Ekta Verma

EPISODE · Mar 9, 2026 · 3 MIN

Adrak | Ekta Verma

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

 अदरक।  एकता वर्मा इनकी देह दुखों की अंतर्मुखी गाँठों से बनी थी जिन्होंने अपनी कब्रों की मिट्टी ठेलकर अपनी देह के लिए जगह बनाई थी।ये आतताइयों का चरित्र पहचानते थे और उनके द्वारा कच्चा चबाए जाने के खिलाफ सुख की जिह्वा पर कसैलेपन की तरह उतरते थे। वे आघातों को अपनी छाती पर सहते थे इनका आखिरी कतरा  प्रतिबद्धताओं की तीखी गंध से महकता था। वे रक्तबीज जैसे थे, उनके टुकड़े जहाँ गिरते हुजूम की शक्ल में वहीं से उग आते। उनका शरीर लोहे के तंतुओं से बँधा था उनको तोड़कर बंदरबाँट करना आसान नहीं था। एक दिन, इनमें से किसी नेजिसके पिता का नाम शंबूक था,ने किताब का आखिरी पृष्ठ पलटकर कहा- यह हमारी कहानी नहीं है।इस इतिहास को जला देना चाहिए ! द्रोणाचार्य की संतानों वाली सभा चीख उठी-  खीं-खीं, खीं-खीं !!! एक औरत ने जो अहिल्या की परपौत्री थी, और मेड्यूसा की नातिन, ने कहा-मेरी योनि एक मज़दूर की तरह खटते हुए असंतोष का नारा उछालना चाहती है,बलत्कृत कामनाओं के नीचे दबा सुख का स्पन्दन खोज लाना चाहती है।देवराजों की सभा चिल्लाने लगी, नुकेले दांतों से नोचने-फाड़ने लगी छी: छी: दुर्दांत! पतिता! जंगल से खदेड़ी गई जातियों का एक वारिसराजधानी के शिक्षण संस्थान में,शोध-प्रबंध में उद्धृत करने लगा अपने पुरखों के हत्यारों की सूची  साक्षात्कार समिति चीखी- खीं-खीं, खीं-खीं खारिज करो, फेंको, बाहर करो!ये तिरस्कृत, बहिष्कृत, अपमानित होती जातियाँ चाहतीं तो एक तटस्थ, समझौतावादी जीवन चुन सकती थीं।लेकिन सहमति में झुके सारों के बीच जहाँ असहमति की उंगली उठाना अपराध हो, वे ओखली में सिर डालकर मूसलों को चुनौती देना धर्म की तरह चुनते हैं। वे अदरक की तरह जीते थे।इनके होने भर से आतताइयों की नंगई ऐसे उघड़ती थी कि वे चीखते-उछलते दाँत -नाखून दिखाते, बंदरों के हुजूम सा दिखते। वही बंदर जो अदरक का स्वाद नहीं जानते।दरअसल सभ्यता के विकास-क्रम में पिछड़े इन अमानुषों के लिए स्वाद भोग का विषय है जबकि मेहनतकशों के लिए वह संघर्ष का पर्याय थाजिन्होंने अपनी जिह्वा पर रोटी से कहीं ज़्यादा, आंसुओं के स्वाद को चखा था,पसीने और पेशाब को चखा था।

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