EPISODE · May 7, 2023 · 6 MIN
Amrapali - Anamika
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
आम्रपाली - अनामिकाथा आम्रपाली का घरमेरी ननिहाल के उत्तर !आज भी हर पूनो की रातखाली कटोरा लिए हाथगुज़रती है वैशाली के खण्डहरों सेबौद्धभिक्षुणी आम्रपाली ।अगल-बगल नहीं देखती,चलती है सीधी मानो ख़ुद से बातें करतीशरदकाल में जैसे(कमण्डल-वमण्डल बनाने की ख़ातिर)पकने को छोड़ दी जाती हैलतर में ही लौकीपक रही है मेरी हर मांसपेशी,खदर-बदर है मेरे भीतर काहहाता हुआ सत !सूखती-टटाती हुईहड्डियाँ मेरीमरे कबूतर-जैसीइधर-उधर फेंकी हुई मुझमेंसोचती हूँ क्या वो मैं ही थीनगरवधू-बज्जिसँघ के बाहर के लोग भी जिसकीएक झलक को तरसते थे ?ये मेरे सन-से सफ़ेद बालथे कभी भौंरे के रँग के कहते हैं लोग,नीलमणि थीं मेरी आँखेंबेले के फूलों-सी झक सफ़ेद दन्तपँक्ति :खण्डहर का अर्द्धध्वस्त दरवाज़ा हैं अब जो !जीवन मेरा बदला, बुद्ध मिले,बुद्ध को घर न्योतकरअपने रथ से जब मैं लौट रही थीकुछ तरुण लिच्छवी कुमारों के रथ सेटकरा गया मेरे रथ काधुर से धुर, चक्के से चक्का, जुए से जुआ !लिच्छवी कुमारों को ये अच्छा कैसे लगता,बोले वे चीख़कर —“जे आम्रपाली, क्यों तरुण लिच्छवी कुमारों के धुर सेधुर अपना टकराती है ?”“आर्यपुत्रो, क्योंकि भिक्खुसंघ के साथभगवान बुद्ध ने भात के लिए मेरा निमन्त्रण किया है स्वीकार !”“जे आम्रपाली !सौ हजार ले और इस भात का निमन्त्रण हमें दे !”“आयपुत्रो, यदि तुम पूरा वैशाली गणराज्य भी दोगे,मैं यह महान भात तुम्हें नहीं देने वाली !”मेरा यह उत्तर सुन वे लिच्छवी कुमारचटकाने लगे उँगलियाँ :‘हाय, हम आम्रपाली से परास्त हुए तो अब चलो,बुद्ध को जीतें !’कोटिग्राम पहुँचे, की बुद्ध की प्रदक्षिणा,उन्हें घर न्योता,पर बुद्ध ने मान मेरा ही रखाऔर कहा ‘रह जाएगी करुणा, रह जाएगी मैत्री,बाक़ी सब ठह जाएगा...’“तो बहा काल-नद में मेरा वैभव...राख की इच्छामती,राख की गँगा,राख की कृष्णा-कावेरी,गरम राख़ की ढेरीयह कायाबहती रहीसदियोंइस तट से उस तट तक !टिमकता रहा एक अँगारा,तिरता रहा राख़ की इस नदी परबना-ठनाठना-बनातैरा लगातार !तैरी सोने की तरी !राख़ की इच्छामती !राख़ की गंगा !राख़ की कृष्णा-कावेरी ।झुर्रियों की पोटली मेंबीज थोड़े-से सुरक्षित हैंवो ही मैं डालती जाती हूँअब इधर-उधर !गिर जाते हैं थोड़े-से बीज पत्थर पर,चिड़िया का चुग्गा बन जाते हैं वे,बाक़ी खिल जाते हैं जिधर-तिधरचुटकी-भर हरियाली बनकर ।”सुनती हूँ मैं गौर से आम्रपाली की बातेंसोचती हूँ कि कमण्डल या लौकी या बीजकोषजो भी बने जीवन, जीवन तो जीवन है !हरियाली ही बीज का सपना,रस ही रसायन है !कमण्डल-वमण्डल बनाने की ख़ातिरशरदकाल में जैसे पकने को छोड़ दी जाती हैलतर में ही लौकीपक रही है मेरी हर मांसपेशी तो पकने दो, उससे क्या ?कितनी तो सुन्दर हैहर रूप में दुनिया !
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Amrapali - Anamika
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