EPISODE · May 29, 2024 · 2 MIN
Andhera Bhi Ek Darpan Hai | Anupam Singh
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
अँधेरा भी एक दर्पण है | अनुपम सिंह अँधेरा भी एक दर्पण है साफ़ दिखाई देती हैं सब छवियाँयहाँ काँटा तो गड़ता ही हैफूल भी भय देता हैकभी नहीं भूली अँधेरे में गही बाँहपृथ्वी सबसे उच्चतम बिन्दु पर काँपी थीजल काँपा था काँपे थे सभी तत्त्ववह भी एक महाप्रलय थाआँधेरे से सन्धि चाहते दिशागामी पाँवटकराते हैं आकाश तक खिंचे तम के पर्दे सेजीवन-मृत्यु और भय का इतना रोमांच!भावों की पराकाष्ठा है यह अँधेराअँधेरे की घाटी में सीढ़ीदार उतरन नहीं होतीसीधे ही उतरना पड़ता है मुँह के बलअँधेरे के आँसू वही देखता हैजिसके होती है अँधेरे की आँख।उजाले के भ्रम से कहीं अच्छा हैइस दर्पण को निहारतेदेखूँ काँपती पृथ्वी कोतत्वों के टकराव कोअँधेरे की देह धर उतरूँ उस बिन्दु परजहाँ सृजित होता है अँधेरातो उजाले में मेरी लाश आएगीयह कविता के लिए जीवन होगा।
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