EPISODE · Jun 5, 2023 · 4 MIN
Baad | Damodar Khadse
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
बाढ़ - दामोदर खड़से बाढ़ जब तोड़ती है दरवाज़े बड़े-बड़े बांधों के तब नन्हें-नन्हें गाँव काले बादलों की नीयत समझ जाते हैं पानी का रंग दिमाग बदरंग कर जाता हैपानी जीवन भी है बिजली भी पानी नहर और झील भी है पानी नाचता हुआ समंदर और मदमस्त बादल है पानी पानी, पानी यानी सबकुछ है पर जब बाढ़ आती है, पानी के विवेक पर प्रश्नचिन्ह लगा जाती है बाढ़ नदी-नालों का पानी समेट बहुमत पा जाती है और अपने आप को बहाव के हाथों सौंप जाती है गति जब छूट जाती है पानी के हाथों से पानी विक्राल हो जाता है तब प्यास भी पानी से घबराती है किनारे जल-समाधि को मजबूर हो जाते हैं फसलें उखड़ने लगती हैं वर्तमान काला और भविष्य अंधा हो जाता है भूतकाल से तब उठती हैं सवालों की प्रतिध्वनियाँ तब रिश्तों को रतौंधी हो जाती है और चांदनी रातों में भी बाढ़ अपनी राह निकालने के लिए सरपट काले आँसू दौड़ाती है ऐसे में भरे-पूरे वृक्ष भी हरहराकर टूट पड़ते हैं विवश डूबती आँखें विप्लव के दृश्य देखती हैं सुनों, रिश्तों में भी कभी-कभी ऐसा ही होता है पता नहीं क्या है जो आदमी को बाढ़ की तरह दौड़ाता है और उसी की आँखों से उसे विप्लव दिखाता है पर घबराओं नहीं, इधर देखो नन्हें-नन्हें दूब के पौधे अपनी ज़मीन से किस तरह जुड़े हैं वर्तमान की आँखों में उभरते नहीं होंगे वे पर उनकी रेशमी जड़ें अपनी धरती से जुड़ी हैं विप्लव के बाद भी नई ऊर्जा से उठते हैं वे सृष्टि ऐसे ही पैधों में पाती है सार्थकता आओ, ऐसी अंधी बाढ़ में हम इन कत्थई कोपलों की रक्षा करें धरती हरी-भरी ही अच्छी लगती है।
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Baad | Damodar Khadse
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