EPISODE · Jul 13, 2024 · 3 MIN
Bachao | Uday Prakash
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
बचाओ - उदय प्रकाश चिंता करो मूर्द्धन्य 'ष' कीकिसी तरह बचा सको तो बचा लो ‘ङ’देखो, कौन चुरा कर लिये चला जा रहा है खड़ी पाईऔर नागरी के सारे अंकजाने कहाँ चला गया ऋषियों का “ऋ'चली आ रही हैं इस्पात, फाइबर और अज्ञात यौगिकधातुओं की तमाम अपरिचित-अभूतपूर्व चीज़ेंकिसी विस्फोट के बादल की तरह हमारे संसार मेंबैटरी का हनुमान उठा रहा है प्लास्टिक का पहाड़और बच्चों के हाथों में बोल रही है कोईडरावनी चीज़डींप...डींप...डींप...बचा लो मेरी नानी का पहियोंवाला काठ का नीला घोड़ासंभाल कर रखो अपने लटूटूपतंगें छुपा दो किसी सुरक्षित जगह परदेखो, हिलता है पृथ्वी परअमरूद का अंतिम पेड़उड़ते हैं आकाश में पृथ्वी के अंतिम तोतेबताएँ सारे विद्दान्मैं कहाँ पर टाँग दूँ अपने दादा की मिरजईकिस संग्रहालय को भेजूँ पिता का बसूलामाँ का करधन और बहन के विछुए मैं किस सरकार को सौपूँ हिफ़ाज़त के लिएमैं अपील करता हूँ राष्ट्रपति से किवे घोषित करेंखिचड़ी, ठठेरा, मदारी, लोहार, किताब, भड़भूँजा,कवि और हाथी कोविलुप्तप्राय राष्ट्रीय प्राणीवैसे खड़ाऊँ, दातुन और पीतल के लोटे कोबचाने की इतनी सख्त ज़रूरत नहीं हैरथ, राजकुमारी, धनुष, ढाल और तांत्रिकों केसंरक्षण के लिए भी ज़रूरी नहीं है कोई क़ानूनबचाना ही हो तो बचाए जाने चाहिएगाँव में खेत, जंगल में पेड़, शहर में हवा,पेड़ों में घोंसले, अख़बारों में सच्चाई, राजनीति मेंनैतिकता, प्रशासन में मनुष्यता, दाल में हल्दीक्या कुम्हार, धर्मनिरपेक्षता औरएक-दूसरे पर भरोसे को बचाने के लिएनहीं किया जा सकता संविधान में संशोधनसरदार जी, आप तो बचाइए अपनी पगड़ीऔर पंजाब का टप्पामुल्ला जी, उर्दू के बाद आप फ़िक्र करें कोरमे के शोरबे काज़ायका बचाने कीइधर मैं एक बार फिर करता हूँ प्रयत्नकि बच सके तो बच जाए हिंदी में समकालीन कविता।
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Bachao | Uday Prakash
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