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Benaras | Kedarnath Singh

EPISODE · Mar 19, 2026 · 4 MIN

Benaras | Kedarnath Singh

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

बनारस | केदारनाथ सिंहइस शहर मे वसंतअचानक आता हैऔर जब आता है तो मैंने देखा हैलहरतारा या मडुवाडीह की तरफ़ सेउठता है धूल का एक बवंडरऔर इस महान पुराने शहर की जीभकिरकिराने लगती हैजो है वह सुगबुगाता हैजो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँआदमी दशाश्वमेध पर जाता हैऔर पाता है घाट का आख़िरी पत्थरकुछ और मुलायम हो गया हैसीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों मेंएक अजीब-सी नमी हैऔर एक अजीब-सी चमक से भर उठा हैभिखारियों के कटोरों का निचाट ख़ालीपनतुमने कभी देखा हैख़ाली कटोरों में वसंत का उतरना!यह शहर इसी तरह खुलता हैइसी तरह भरताऔर ख़ाली होता है यह शहरइसी तरह रोज़-रोज़ एक अनंत शवले जाते हैं कंधेअँधेरी गली सेचमकती हुई गंगा की तरफ़इस शहर में धूलधीरे-धीरे उड़ती हैधीरे-धीरे चलते हैं लोगधीरे-धीरे बजाते हैं घंटेशाम धीरे-धीरे होती हैयह धीरे-धीरे होनाधीरे-धीरे होने की एक सामूहिक लयदृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर कोइस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं हैकि हिलता नहीं है कुछ भीकि जो चीज़ जहाँ थीवहीं पर रखी हैकि गंगा वहीं हैकि वहीं पर बँधी है नावकि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँसैकड़ों बरस सेकभी सई-साँझबिना किसी सूचना केघुस जाओ इस शहर मेंकभी आरती के आलोक मेंइसे अचानक देखोअद्भुत है इसकी बनावटयह आधा जल में हैआधा मंत्र मेंआधा फूल में हैआधा शव मेंआधा नींद में हैआधा शंख मेंअगर ध्यान से देखोतो यह आधा हैऔर आधा नहीं हैजो है वह खड़ा हैबिना किसी स्तंभ केजो नहीं है उसे थामे हैंराख और रोशनी के ऊँचे-ऊँचे स्तंभआग के स्तंभऔर पानी के स्तंभधुएँ केख़ुशबू केआदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभकिसी अलक्षित सूर्य कोदेता हुआ अर्घ्यशताब्दियों से इसी तरहगंगा के जल मेंअपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहरअपनी दूसरी टाँग सेबिल्कुल बेख़बर!

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Benaras | Kedarnath Singh

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