EPISODE · Jun 19, 2023 · 3 MIN
Chinta | Priyadarshan
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
चिंताएँ कभी खत्म नहीं होतींनींद में भी घुसपैठ कर जाती हैंधूसर सपनों वाले कपड़े पहनकरजागते समय साथ-साथ चला करती हैंकभी-कभी उनके दबाव कुछ कम हो जाते हैंतब फैला-फैला लगता है आकाश, प्यारी प्यारी लगती है धूपनरम मुलायम लगती है धरतीलेकिन जब कभी बढ़ जाती हैं चिंताएँबाकी कुछ जैसे सिकुड़ जाता है हवा भी भारी हो जाती हैसाँस लेने में लगती है मेहनतएक एक कदम बढ़ाना पहाड़ चढ़ने के बराबर मालूम होता हैकहाँ से पैदा होती है चिंता?क्या हमारे भीतर बसे आदिम डर से?या हमारे बाहर बसे आधुनिक समय से?या हमारे चारों ओर पसरे इस दुनिया सेजो दरअसल बनने-टूटने कितने खत्म होने वाले सिलसिले का नाम हैया निजी उलझनों के जाल से या बाहरी जंजाल सेहमारे स्वभाव से या दूसरों के प्रभाव से?कभी कभी ऐसे भी वक्त आते हैंजब बिल्कुल चिंतामुक्त होता है आदमीएक तरह के सूफियाना आत्मविश्वास से भरा हुआकि जो भी होगा निबट लेंगेएक तरह की अलमस्त फक्कड़ता से लैसकि ऐसी कौन सी चिंता है जो जिंदगी से बड़ी हैकभी इस दार्शनिक खयाल को जीता हुआकि चिंता है तो जिंदगी हैलेकिन जिंदगी है इसलिए चिंता जाती नहींकुछ न हो तो इस बात की शुरू हो जाती हैकि पता नहीं कब तक बचा रहेगा चिंतामुक्त समयबस इतनी सी बात समझ में आती हैआदमी है तो इसलिए चिंता है।
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Chinta | Priyadarshan
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