EPISODE · Jun 8, 2025 · 3 MIN
Daud | Kumar Ambuj
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
दौड़ -कुमार अम्बुज मुझे नहीं पता मैं कब से एक दौड़ में शामिल हूँविशाल अंतहीन भीड़ है जिसके साथ दौड़ रहा हूँ मैंगलियों में, सड़कों पर, घरों की छतों पर, तहखानों मेंतनी हुई रस्सी पर सब जगह दौड़ रहा हूँ मैंमेरे साथ दौड़ रही है एक भीड़जहाँ कोई भी कम नहीं करना चाहता अपनी रफ्तारमुझे ठीक-ठीक नहीं मालुम मैं भीड़ के साथ दौड़ रहा हूँया भीड़ मेरे साथअकेला पीछे छूट जाने के भय से दौड़ रहा हूँया आगे निकल जाने के उन्माद मेंमुझे नहीं पता मैं अपने पड़ौसी को परास्त करना चाहता हूँया बचपन के किसी मित्र कोया आगे निकल जाना चाहता हूँ किसी अनजान आदमी सेमैं दौड़ रहा हूँ बिना यह जाने कि कौन है मेरा प्रतिद्वंद्वीजब शामिल हुआ था दौड़ मेंमुझे दिखाई देती थीं बहुत सी चीज़ें खेत, पहाड़, जंगलदिखाई देते थे पुल, नदियाँ, खिलौने और बचपन के खेलदिखते थे मित्रों, रिश्तेदारों और परिचितों के चेहरेसुनाई देती थीं पक्षियों की आवाज़ें समुद्र का शोर और हवा का संगीतअब नहीं दिखाई देता कुछ भीन बारिश न धुंधन खुशी न बेचैनीन उम्मीद न संतापन किताबें न सितारदिखाई देते हैं सब तरफ एक जैसे लहुलुहान पाँवऔर सुनाई देती हैं सिर्फ उनकी थकी और भारीऔर लगभग गिरने से अपने को सँभालती हुईंधप धप्प धप्प् सी आवाजेंतलुए सूज चुके हैं सूख रहा है मेरा गलाजवाब दे चुकी हैं पिंडलियाँभूल चुका हूँ मैं रास्तेमुझे नहीं मालूम कहाँ के लिए दौड़ रहा हूँ और कहाँ पहुँचूँगाभीड़ में गुम चुके हैं मेरे बच्चे और तमाम प्यारे जनकोई नहीं दिखता दूर-दूर तक जो मुझे पुकार सकेया जिसे पुकार सकूँ मैं कह सकूँ कि बस, बहुत हुआ अबहद यह है कि मैं बिलकुल नहीं दौड़ना चाहताकिसी धावक की तरह पार नहीं करना चाहता यह छोटा सा जीवननहीं लेना चाहता हाँफती हुईं साँसेंहद यही है कि फिर भी मैं खुद को दौड़ता हुआ पाता हूँथकान से लथपथ और बदहवास
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Daud | Kumar Ambuj
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