EPISODE · Dec 12, 2025 · 2 MIN
Jeevan Ki Jai | Maithlisharan Gupt
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
जीवन की जय। मैथिलीशरण गुप्तमृषा मृत्यु का भय है,जीवन की ही जय है।जीवन ही जड़ जमा रहा है,निज नव वैभव कमा रहा है,पिता-पुत्र में समा रहा है,यह आत्मा अक्षय है,जीवन की ही जय है!नया जन्म ही जग पाता है,मरण मूढ़-सा रह जाता है,एक बीज सौ उपजाता है,स्रष्टा बड़ा सदय है,जीवन की ही जय है।जीवन पर सौ बार मरूँ मैं,क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं,यदि न उचित उपयोग करूँ मैं,तो फिर महा प्रलय है,जीवन की ही जय है।
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Jeevan Ki Jai | Maithlisharan Gupt
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