EPISODE · Feb 25, 2024 · 2 MIN
Khichdi | Anamika
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
खिचड़ी | अनामिकाइतने बरस बीते, इतने बरस ! सन्तोष है तो बस इतना कि मैंने ये बाल धूप में तो सफेद नहीं किए ! इन खिचड़ी बालों का वास्ता, देखा है संसार मैंने भी थोड़ा-सा ! दुनिया के हर कोने क्या जाने क्या-क्या खिचड़ी पक रही है : संसद में, निर्णायक मंडल में, दूर वहाँ इतिहास के खंडहरों में ! 'चाणक्य की खिचड़ी' से लेकर 'बीरबल की खिचड़ी' तक सल्तनतें हैं और रणकौशल ! मुझे खिचड़ी-भाषा से कोई शिकायत नहीं ! खिचड़ी गरीब मेहनतकश का सबसे सुस्वादु और पौष्टिक भोजन है, पर मैं सुपली में फटककर कुछ कंकड़ चुन लेना चाहती हूँ! और तब धो-धोकर सीधा डबका लेना चाहती हूँ अपना सचसादा हीनमक-मिर्च मिलाए बिना ! डबकाना चाहती हूँ अपना सच उस बड़े सच की हँड़िया में जो साझा है! और चाहे जो हो- साझी सच्चाई काठ की हंड़िया नहीं है कि दुबारा न चढ़े आँच पर ! रोज़ वह करती है आग की सवारी, रोज़ रगड़घस सहती है हमारी-तुम्हारी ! मुझे खिचड़ी-भाषा से कोई शिकायत नहीं। छौंक के करछुल में जीरा बराबर चटक रहे हैं मेरे सपने- इसी में !
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Khichdi | Anamika
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