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Neembu Maangkar | Chandrakant Devtale

EPISODE · Oct 27, 2023 · 4 MIN

Neembu Maangkar | Chandrakant Devtale

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

नीम्बू माँगकर | चन्द्रकान्त देवतालेबेहद कोफ़्त होती है इन दिनोंइस कॉलोनी में रहते हुएजहाँ हर कोई एक-दूसरे कोजासूस कुत्ते की तरह सूँघता हैअपने-अपने घरों में बैठे लोग वहीं से कभी-कभारटेलीफोन के ज़रिये अड़ोस-पड़ोस की तलाशी लेते रहते हैंपर चेहरे पर एक मुस्कान चिपकी रहती हैजो एक-दूसरे को कह देती है — " हम स्वस्थ हैं और सानंदऔर यह भी की तुम्हें पहचानते हैं, ख़ुश रहो ",यहाँ तक भी ठीक हैपर अजीब लगता है की घरु ज़रूरतों के मामले मेंसब के सब आत्मनिर्भर और बढ़िया प्रबंधक हो गए हैंपुरानी बस्ती में कोई दिन नहीं जाता थाकी बड़ी फज़र की कुण्डी नहीं खटखटाई जातीऔर कोई बच्चा हाथ में कटोरी लिए नहीं कहता 'बुआमाँ ने चाय-पत्ती मँगाई है'किसी के यहाँ आटा खुट जाताऔर कभी ऐन छौंक से पहलेप्याज, लहसुन या अदरक की गाँठ की माँग होतीहोने पर बराबर दी जाती चाहे कुढ़ते-बड़बड़ करते हुएपर यह कुढ़न दूसरे या तीसरे दिन हीआत्मीय आवाज़ में बदल जातीजब जाना पड़ता कहते हुएभाभी ! देख थोड़ी देर पहले ही ख़त्म हुआ दूधऔर फिर आ गए हैं चाय पीने वालेरोज़मर्रा की ऐसी माँगा-टूँगी की फेहरिस्त मेंऔर भी कई चीज़ें शामिल रहतींजैसे तुलसी के पत्ते या कढ़ी-नीमबेसन-बड़े भगोने, बाम की शीशीऔर वक़्त पड़ने पर दस-बीस रुपए भीऔर इनके साथ ही आपसी सुख-दुःख भी बँटता रहताजो इस पृथ्वी का दिया होता प्राकृतिकऔर दुनिया के हत्यारों का भीपर इस कॉलोनी में लगता हैसभी घरों में अपने-अपने बाज़ार हैं और बैंकें भीपर नीम्बू शायद ही मिलेहाँ ! नीम्बू एक सुबह मैं इसी को माँगने दो-तीन घर गयापद्मा जी, निर्मला जी, आशा जी के घर तो होने ही थेनीम्बू क्यूँकि इसके पेड़ भी हैं उनके यहाँपर हर जगह से 'नहीं है' का टका-सा जवाब मिलामैंने फ़ोन भी किएदीपा जी ने तो यहाँ तक कह दिया'क्यों माँगते है आप मुझसे नीम्बू'मै क्या जवाब देताबुदबुदाया — इतने घर और एक नीम्बू तक नहींउज्जैन फ़ोन लगाकरकमा को बताया यह वाक़यावहीं से वह बड़बड़ाईवहाँ माँगा-देही का रिवाज़ नहींसमझाया था पहले हीफिर भी तुम बाज़ नहीं आए आदत से अपनीवहाँ इंदौर में नीम्बू माँगकर तुमनेयहाँ उज्जैन में मेरी नाक कटवा ही दीहँसी आई मुझे अपनी नाक पर हाथ फेरतेजो कायम मुकम्मल थी और साबूत भी

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