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Pagdandiyan | Madan Kashyap

EPISODE · Mar 31, 2024 · 3 MIN

Pagdandiyan | Madan Kashyap

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

पगडण्डियाँ - मदन कश्यप हम नहीं जानते उन उन जगहों कोवहाँ-वहाँ हमें ले जाती हैं पगडण्डियाँजहाँ-जहाँ जाती हैं पगडण्डियाँकभी खुले मैदान मेंतो कभी सघन झाड़ियों में कभी घाटियों में तो कभी पहाड़ियों में जाने कहाँ-कहाँ ले जाती हैं पगडण्डियोंराजमार्गों की तरहपगडण्डियों का कोई बजट नहीं होता कोई योजना नहीं बनतीबस बथान से बगान तकमेड़ से मचान तकखेत से खलिहान तकऔर टोले से सिवान तक चक्कर लगाने वाले कामकाजी पाँव बनाते हैं पगडण्डियाँथकी हुई नींद की तरह सपाट होती हैं पगडण्डियाँ जिन पर सपनों की तरह उगे होते हैं पाँव के निशानसपनों काजो कभी कीचड़ से गीले होकर संकल्पों के पाँव से चिपक जाते हैं तो कभी धूल से हल्के होकर इधर-उधर बिखर जाते हैं बड़ा अटूट रिश्ता है पगडण्डियों सेसिर्फ पाँव ही नहीं सपने भी बनाती हैं पगडण्डियाँपूरे गाँव की जिजीविषा के पाँव पूरे गाँव का गाँव की तरह ज़िन्दा रहने का सपनापगडण्डियों पर गाड़ियाँ नहीं चलतीं फौजी झण्डा-परेड नहीं होती टैंकों की गड़गड़ाहट भी सुनायी नहीं देती पगडण्डियों पर चलते हैं गाँवचलते हैंखेतों से धान के बोझे और हरे चारे लाने वाले किसान नमक-हल्दी के लिए हाट जाने वाली कलकतियों की औरतें जलावन के लिए बगीचों से सूखे पत्ते चुनकर लाने वाले बच्चेअपनी मिहनत सेकिसान, औरतें और बच्चे इतिहास के साथ-साथ पगडण्डियाँ बनाते हैं और जब कभी पगडण्डियों को छोड़ राजमार्गों पर निकल आते हैं इतिहास बदल जाता है!

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Pagdandiyan | Madan Kashyap

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