EPISODE · Oct 21, 2023 · 3 MIN
Ummeed | Damodar Khadse
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
उम्मीद | दामोदर खड़से कभी-कभी लगता रहा मुझे समय कैसे कटेगा जिंदगी का जब होगा नहीं कोई फूल बहेगी नहीं कोई नदी पहाड़ हो जाएँगे निर्वसन मौसम में न होगा कोई त्योहार हवाओं में होगी नहीं गंध समुद्र होगा खोया-खोया उदास शामें गुमसुम-गुमसुम और सुबह में न कोई उल्लास कैसे कटेगा तब समयजिंदगी का?सोच-सोच मैं होता रहता सदा अकेला पर आ जाती है ऐसे में कोई आवाज़ भीतर से मंदिर की घंटी की तरह ज्यों जाग गए हों देवता सारे चारों ओर हो रहे मंत्रोच्चार से लद गए हों वृक्ष-वनस्पतियाँधूप की रोशनी मेंदिख रहा हो सब पारदर्शी जाग गई हो प्रकृति सारीऔर समय मेरे कानों मेंफुसफुसाता है जोर सेमैं थाम लेता हूँ अचकचाकरपानी से भरे बादलों कोऔर नमी मेरे भीतर तकदौड़ जाती है...अपनी धरती से उठती आवाज़जगाती उम्मीद बहुत हैफिर लगता है, बहुत सहारे बाकी हैं अभी!
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Ummeed | Damodar Khadse
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