EPISODE · Jul 18, 2025 · 2 MIN
Uski Grahasthi | Rajesh Joshi
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
उसकी गृहस्थी | राजेश जोशी थकी हारी लौटी है वो आफिस से अभीटिफिन बाक्स को रसोई में रखती है।मुँह पर पानी के छीटे मारती हैबाहर निकल आई लट को वापस खोंसती है।बालों मेंआँखों को हौले से दबाती है हथेलियों सेउठती है और रसोईघर की ओर जाने को होती है।मैं कहता हूँ, 'बैठो, तुम, आज मैं चाय बनाता हूँ !मेरी आवाज़ की नोक मुझ़ी को चुभती है।गैस जला कर चाय का पानी चढ़ाता हूँऔर दूसरे ही पल आवाज़ लगाता हूँसुनो शक्कर किस डब्बे में रखी हैऔर चाय की पत्ती कहाँ है ?साड़ी का पल्लू कमर में खोंसती हुई वो आती है।मुझे हटाते हुए कहती है- हटो, तुम्हें नहीं मिलेगी कोई चीज़।होठों को तिरछा करती अजीब ढंग से मुस्कुराती है।मुश्किल है उस मुस्कुराहट का ठीक-ठीक अर्थसमझा पानाजैसे कहती हो यह मेरी सृष्टि हैतुम नहीं जान पाओगे कभीकि किन बादलों में रखी हैं बारिशें और किनमें रखा है कपासकोई डब्बा खोलते हुए कहती है :यह तो मैं हूँ कि अबेर रखा है सब कुछ वरना तुम तो ढूंढ नहीं पाते अपने आप कोजाओं बाहर जाकर टी वी देखोएक काम पूरा नहीं करोगे और फैला दोगेमेरी पूरी रसोई ।
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Uski Grahasthi | Rajesh Joshi
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