EPISODE · Apr 20, 2024 · 2 MIN
Yatra | Naresh Saxena
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
यात्रा | नरेश सक्सेना नदी के स्रोत पर मछलियाँ नहीं होतीं शंख–सीपी मूँगा-मोती कुछ नहीं होता नदी के स्रोत पर गंध तक नहीं होती सिर्फ़ होती है एक ताकत खींचती हुई नीचे जो शिलाओं पर छलाँगें लगाने पर विवश करती हैसब कुछ देती है यात्रा लेकिन जो देते हैं धूप-दीप और जय-जयकार देते हैं वही मैल और कालिख से भर देते हैंधुआँ-धुआँ होती है नदी बादल-बादल होती है नदी लौटती है फिर से उन्हीं निर्मल ऊँचाइयों की ओरलेकिन इस यात्रा में कोई भी नहीं देता साथ वे शिलाएँ भी नहीं जो साथ चलने की कोशिश में रेत हो गई थींवापसी की यात्रा में नदी होती है रंगहीन गंधहीन स्वादहीन।
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Yatra | Naresh Saxena
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