EPISODE · Jan 4, 2026 · 3 MIN
Aaj Ki Raat Tujhe | Gopaldas Neeraj
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ । गोपालदास नीरजआज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँकौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले?बम बारूद के इस दौर में मालूम नहींऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले।ज़िंदगी सिर्फ़ है ख़ुराक टैंक तोपों कीऔर इंसान है एक कारतूस गोली कासभ्यता घूमती लाशों की इक नुमाइश हैऔर है रंग नया ख़ून नई होली का।कौन जाने कि तेरी नर्गिसी आँखों में कलस्वप्न सोए कि किसी स्वप्न का मरण सोएऔर शैतान तेरे रेशमी आँचल से लिपटचाँद रोए कि किसी चाँद का कफ़न रोए।कुछ नहीं ठीक है कल मौत की इस घाटी मेंकिस समय किसके सबेरे की शाम हो जाएडोली तू द्वार सितारों के सजाए ही रहेऔर ये बारात अँधेरे में कहीं खो जाए।मुफ़लिसी भूख ग़रीबी से दबे देश का दुखडर है कल मुझको कहीं ख़ुद से न बाग़ी कर देज़ुल्म की छाँह में दम तोड़ती साँसों का लहूस्वर में मेरे न कहीं आग अंगारे भर दे।चूड़ियाँ टूटी हुई नंगी सड़क की शायदकल तेरे वास्ते कंगन न मुझे लाने देझुलसे बाग़ों का धुआँ खोए हुए पात कुसुमगोरे हाथों में न मेहँदी का रंग आने दें।यह भी मुमकिन है कि कल उजड़े हुए गाँव गलीमुझको फ़ुर्सत ही न दें तेरे निकट आने कीतेरी मदहोश नज़र की शराब पीने कीऔर उलझी हुई अलकें तेरी सुलझाने की।फिर अगर सूने पेड़ द्वार सिसकते आँगनक्या करूँगा जो मेरे फ़र्ज़ को ललकार उठे?जाना होगा ही अगर अपने सफ़र से थक करमेरी हमराह मेरे गीत को पुकार उठे।इसलिए आज तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँआज मैं आग के दरिया में उतर जाऊँगागोरी-गोरी-सी तेरी संदली बाँहों की क़समलौट आया तो तुझे चाँद नया लाऊँगा।
What this episode covers
आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँ । गोपालदास नीरजआज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँकौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले?बम बारूद के इस दौर में मालूम नहींऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले।ज़िंदगी सिर्फ़ है ख़ुराक टैंक तोपों कीऔर इंसान है एक कारतूस गोली कासभ्यता घूमती लाशों की इक नुमाइश हैऔर है रंग नया ख़ून नई होली का।कौन जाने कि तेरी नर्गिसी आँखों में कलस्वप्न सोए कि किसी स्वप्न का मरण सोएऔर शैतान तेरे रेशमी आँचल से लिपटचाँद रोए कि किसी चाँद का कफ़न रोए।कुछ नहीं ठीक है कल मौत की इस घाटी मेंकिस समय किसके सबेरे की शाम हो जाएडोली तू द्वार सितारों के सजाए ही रहेऔर ये बारात अँधेरे में कहीं खो जाए।मुफ़लिसी भूख ग़रीबी से दबे देश का दुखडर है कल मुझको कहीं ख़ुद से न बाग़ी कर देज़ुल्म की छाँह में दम तोड़ती साँसों का लहूस्वर में मेरे न कहीं आग अंगारे भर दे।चूड़ियाँ टूटी हुई नंगी सड़क की शायदकल तेरे वास्ते कंगन न मुझे लाने देझुलसे बाग़ों का धुआँ खोए हुए पात कुसुमगोरे हाथों में न मेहँदी का रंग आने दें।यह भी मुमकिन है कि कल उजड़े हुए गाँव गलीमुझको फ़ुर्सत ही न दें तेरे निकट आने कीतेरी मदहोश नज़र की शराब पीने कीऔर उलझी हुई अलकें तेरी सुलझाने की।फिर अगर सूने पेड़ द्वार सिसकते आँगनक्या करूँगा जो मेरे फ़र्ज़ को ललकार उठे?जाना होगा ही अगर अपने सफ़र से थक करमेरी हमराह मेरे गीत को पुकार उठे।इसलिए आज तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूँआज मैं आग के दरिया में उतर जाऊँगागोरी-गोरी-सी तेरी संदली बाँहों की क़समलौट आया तो तुझे चाँद नया लाऊँगा।
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Aaj Ki Raat Tujhe | Gopaldas Neeraj
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