EPISODE · Jul 11, 2026 · 3 MIN
Abhida Ki Ek Sham | Vivek Nirala
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
अभिधा की एक शाम। विवेक निराला एक छोटी शाम जोलम्बी खिंचती जाती थीबिल्कुल अभिधा में।रक्ताभा लिए रविलुकता जाता था।लक्षणा के लद चुकेदिनों के बादअभिधा की एक छोटी-सी शामधीरे-धीरेकरती रही अपना प्रसारबढ़ती जाती थी भीड़सिकुड़ता रहा सभागार।रचना ही बचना हैकोहराम मचना है-कहा कभी किसी नेबे दांत जबड़ों के बीचकुतरे जाते हुए।अहंकार से लथपथशतपथी ब्राहम्णों केपान से ललाये मुखसे होते हुए आख़िरपेट में जा पचना है।आयताकार प्रकाश पुंज फैला है भीतरबाहर शाम कोलील रहा अंधकारमंच पर आसीनपहने कौपीनलकदक लिये घातक हथियारआतुर थे करने को एकल संहार।वायु-मार्ग से आयेऋषिगण करते आलोचनलोहित लोचन।थके चरण वह वधस्थल को जाता उन्मन नतनयन।माला और दुशाला कोडाला एक कोने में:वध के पश्चात रक्तसहेज कर भगोने में,तेज़ धार वह कटारपोंछ-पाछ साफ़ करअन्तिम यह वाक्य कहा-"हल्का है, बासी है कल का है,डिम्ब है न बिम्ब हैअभिधा है, अभिधा हैअग्नि को जो अर्पण हैमेरी प्रिय समिधा है।"
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