EPISODE · Jan 31, 2024 · 2 MIN
Achanak Nahi Gayi Ma | Vishwanath Prasad Tiwari
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
अचानक नहीं गई माँ | विश्वनाथ प्रसाद तिवारी अचानक नहीं गई माँ जैसे चला जाता है टोंटी का पानी या तानाशाह का सिंहासन थोड़ा-थोड़ा रोज गई वह जैसे जाती है कलम से स्याही जैसे घिसता है शब्द से अर्थसुकवा और षटमचिया से नापे थे उसने समय के सत्तर वर्ष जीवन को कुतरती धीरे-धीरे गिलहरी-सी चढ़ती-उतरती काल वृक्ष परगीली-सूखी लकड़ी-सी चूल्हे की धुआँ देती सुलगती जलतीरात काटने के लिए परियों के किस्से सुनाती अँधेरे से लड़ने के लिए संझा-पराती के गीत गाती पृथ्वी और आकाश के पिंजरे में फड़फड़ाती बीमार घड़ी-सी टिक्-टिक् चलतीअचानक नहीं गई माँ थोड़ा-थोड़ा रोज गई जैसे जाती है आँख की रोशनी या अतीत की स्मृति ।
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