EPISODE · Oct 20, 2025 · 3 MIN
Anubhav | Nilesh Raghuvanshi
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
अनुभव | नीलेश रघुवंशी तो चलूँ मैं अनुभवों की पोटली पीठ पर लादकर बनने लेखकलेकिन मैंने कभी कोई युद्ध नहीं देखाखदेड़ा नहीं गया कभी मुझे अपनी जगह सेनहीं थर्राया घर कभी झटकों से भूकंप केपानी आया जीवन में घड़ा और बारिश बनकरविपदा बनकर कभी नहीं आई बारिशदंगों में नहीं खोया कुछ भी न खुद को न अपनों कोकिसी के काम न आया कैसा हलका जीवन है मेरातिस पर मुझे कागज़ की पुड़िया बाँधना नहीं आता लाख कोशिश करूँ सावधानी बरतूँ खुल ही जाती है पुड़ियापुड़िया चाहे सुपारी की हो या हो जलेबी कीनहीं बँधती तो नहीं बँधती मुझसे कागज़ की पुड़िया नहीं सधतीअगर मैं लकड़हारा होती तो कितने करीब होती जंगल केहोती मछुआरा तो समुद्र मेरे आलिंगन में होताअगर अभिनय आता होता मुझे तो एक जीवन में जीती कितने जीवनजीवन में मलाल न होता राजकुमारी होती तो कैसी होतीऔर तो और अगले ही दिन लकड़हारिन बनकर घर-घर लकड़ी पहुँचातीअगर मैं जादूगर होती तोपल-भर में गायब कर देती सिंहासन पर विराजे महाराजा दुःख कोसचमुच कंचों की तरह चमका देती हर एक का जीवनसोचती बहुत हूँ लेकिन कर कुछ नहीं पाती हूँ मेरा जीवन न इस पार का है न उस पार कातो कैसे निकलूं मैं अनुभवों की पोटली पीठ पर लादकर बनने लेखक ?
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अनुभव | नीलेश रघुवंशी तो चलूँ मैं अनुभवों की पोटली पीठ पर लादकर बनने लेखकलेकिन मैंने कभी कोई युद्ध नहीं देखाखदेड़ा नहीं गया कभी मुझे अपनी जगह सेनहीं थर्राया घर कभी झटकों से भूकंप केपानी आया जीवन में घड़ा और बारिश बनकरविपदा बनकर कभी नहीं आई बारिशदंगों में नहीं खोया कुछ भी न खुद को न अपनों कोकिसी के काम न आया कैसा हलका जीवन है मेरातिस पर मुझे कागज़ की पुड़िया बाँधना नहीं आता लाख कोशिश करूँ सावधानी बरतूँ खुल ही जाती है पुड़ियापुड़िया चाहे सुपारी की हो या हो जलेबी कीनहीं बँधती तो नहीं बँधती मुझसे कागज़ की पुड़िया नहीं सधतीअगर मैं लकड़हारा होती तो कितने करीब होती जंगल केहोती मछुआरा तो समुद्र मेरे आलिंगन में होताअगर अभिनय आता होता मुझे तो एक जीवन में जीती कितने जीवनजीवन में मलाल न होता राजकुमारी होती तो कैसी होतीऔर तो और अगले ही दिन लकड़हारिन बनकर घर-घर लकड़ी पहुँचातीअगर मैं जादूगर होती तोपल-भर में गायब कर देती सिंहासन पर विराजे महाराजा दुःख कोसचमुच कंचों की तरह चमका देती हर एक का जीवनसोचती बहुत हूँ लेकिन कर कुछ नहीं पाती हूँ मेरा जीवन न इस पार का है न उस पार कातो कैसे निकलूं मैं अनुभवों की पोटली पीठ पर लादकर बनने लेखक ?
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Anubhav | Nilesh Raghuvanshi
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