EPISODE · Mar 7, 2024 · 2 MIN
Baarish Ke Kandhe Par Sar rakhta Hun
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
बारिश के काँधे पर सिर रखता हूँ | शहंशाह आलमपीड़ा में पेड़ जब दुःख बतियाते हैं दूसरे पेड़ सेमैं बारिश के काँधे पर सिर रखता हूँ अपनाआदमी बमुश्किल दूसरे का दुःख सुनना पसंद करता हैबारिश लेकिन मेरा दुखड़ा सुनने ठहर जाती हैकभी खिड़की के पास कभी दरवाज़े पर तो कभी ओसारे मेंकवि होना कितना कठिन है आज के समय मेंऔर गिरहकट होना कितना आसान काम हैहत्यारा होना तो और भी आसान होता हैबस चाकू निकाला और घोंप डालासामने से आ रहे कम बातचीत करने वाले के पेट मेंगिरहकट से या हत्यारे से बचाने का कोई उपायबारिश के पास कभी नहीं होताहाँ, इतना उसके पास ज़रूर होता हैकि बारिश मेरे आँसुओं को छुपा लेती है अपने पानी मेंताकि मेरे क्रांतिकारी होने का भ्रम बचा रहेइस पूरे कालखंड की कविता में।
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