EPISODE · Aug 31, 2024 · 2 MIN
Baarish Mein Joote Ke Bina Nikalta Hun Ghar Se | Shahanshah Alam
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
बारिश में जूते के बिना निकलता हूँ घर से | शहंशाह आलम बारिश में जूते के बिना निकलता हूँ घर सेबचपन में हम सब कितनी दफ़ा निकल जाते थेघर से नंगे पाँव बारिश के पानी में छपाछप करनेउन दिनों हम कवि नहीं हुआ करते थेख़ालिस बच्चे हुआ करते थे नए पत्ते के जैसेबारिश में बिना जूते के निकलनाअपने बचपन को याद करना हैइस निकलने में फ़र्क़ इतना भर हैकि माँ की आवाज़ें नहीं आतीं पीछे सेसच यही है माँ की मीठी आवाज़ें पीछा कहाँ छोड़ती हैंदिन बारिश के हों, दिन धूप के हों या दिन बर्फ़ के होंमाँ की आवाज़ों को पकड़े-पकड़े मैं घर से दूर चला आया हूँअब बारिश की आवाज़ें माँ की आवाज़ें हैंबाँस के पेड़ों से भरे हुए इस वन में मेरे लिए।
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