EPISODE · Aug 13, 2024 · 3 MIN
Dhela | Uday Prakash
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
ढेला | उदय प्रकाश वह था क्या एक ढेला थाकहीं दूर गाँव-देहात से फिंका चला आया थादिल्ली की ओररोता था कड़कड़डूमा, मंगोलपुरी, पटपड़गंज मेंखून के आँसू चुपचापढेले की स्मृति में सिर्फ़ बचपन की घास थीजिसका हरापन दिल्ली में हर सालऔर हरा होता थाएक दिन ढेला देख ही लिया गया राजधानी मेंलोग-बाग चौंके कि ये तो कैसा ढेला है।कि रोता भी है आदमी लोगों की तरहदया भी उपजी कुछ के भीतरकुछ ने कहा कैसे क्या तो करें इसकानौकरी पर रखें तो क्या पता किसी कासर ही फोड़ देज़्यादातर काँच की हैं दीवारें और इतने कीमतीइलेक्ट्रॉनिक आइटमकुछ ने कहा विश्वसनीयता का भी प्रश्न हैढेले की जात कब किस दिशा को लुढ़क जाएक्या पता किसी बारिश में ही घुल जाएएक दिन एक लड़की ने पढ़ी ढेले की कविताऔर फिरआया उसे खुब ज़ोर का रोनाढेला भीतर से काँपा कि आया उसके भीजीवन में प्यारआखिरकारउस रात उसने रात भर जाग-जागकर लिखीएक कविताकि दिल्ली में भी हैदुनिया के सबसे बड़े बैलून से भी ज़्यादा बड़ाएक दिलजहाँ एक दिन फिरा करते हैं ढेलों के भी दिनलेकिन अगले दिन वह भागाऔर फिर भागता ही रहाजब लड़की ने अपने प्रेमी से कहा-'सँभालकर उठाओ और रख दो इस बेचारे कोगुड़गाँव के किसी खेत मेंया टिकट देकर चढ़ा दो छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस मेंऔर भूल जाओउसी तरह जैसे राजधानी की सड़क पर हर रोज़हम भूल जाते हैं कोई- न-कोईदहशतनाक दुर्घटना'आदमी लोगों, सुनो!इस ढेले के भी हैं कुछ विचारढेले को भी करनी है बाज़ार में ख़रीदारीइस कठिन समय में ढेले का सोचना हैउसको भी निभानी है कोई भूमिकाभाई, कोई है ?कोई सुनेगा ढेले का मूल्यवान प्रवचनकोई अखबार छापेगालोकतंत्र और मनुष्यता के संकट परढेले के विचार?भाई, कोई है,जो उसे उठाये उस तरह जिस तरह नहीं उठाया जाता कोई ढेला?
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Dhela | Uday Prakash
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