EPISODE · Sep 20, 2024 · 1 MIN
Dukh | Achal Vajpeyi
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
दुख / अचल वाजपेयीउसे जब पहली बार देखालगा जैसेभोर की धूप का गुनगुना टुकड़ाकमरे में प्रवेश कर गया हैअंधेरे बंद कमरे का कोना-कोनाउजास से भर गया हैएक बच्चा हैजो किलकारियाँ मारतामेरी गोद में आ गया हैएकांत में सैकड़ों गुलाब चिटख गए हैंकाँटों से गुँथे हुए गुलाबएक धुन है जो अंतहीन निविड़ मेंदूर तक गहरे उतरती हैमेरे चारों ओर उसनेएक रक्षा-कवच बुन दिया हैअब मैं तमाम हादसों के बीचसुरक्षित गुज़र सकता हूँ
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Dukh | Achal Vajpeyi
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