EPISODE · May 28, 2026 · 2 MIN
Ek Aur Dhang | Shrikant Verma
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
एक और ढंग। श्रीकांत वर्माभागकर अकेलेपन से अपनेतुममें मैं गया।सुविधा के कई वर्षतुममें व्यतीत किए।कैसे?कुछ स्मरण नहीं।मैं और तुम! अपनी दिनचर्या केपृष्ठ परअंकित थेएक संयुक्ताक्षर!क्या कहूँ! लिपि की नियतिकेवल लिपि की नियतिथी—तुममें से होकर भी,बसकर भी,संग-संग रहकर भीबिल्कुल असंग हूँ।सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है।- लेकिन! क्यों लगता है मुझेप्रेमअकेले होने का हीएक और ढंग है।
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एक और ढंग। श्रीकांत वर्माभागकर अकेलेपन से अपनेतुममें मैं गया।सुविधा के कई वर्षतुममें व्यतीत किए।कैसे?कुछ स्मरण नहीं।मैं और तुम! अपनी दिनचर्या केपृष्ठ परअंकित थेएक संयुक्ताक्षर!क्या कहूँ! लिपि की नियतिकेवल लिपि की नियतिथी—तुममें से होकर भी,बसकर भी,संग-संग रहकर भीबिल्कुल असंग हूँ।सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है।- लेकिन! क्यों लगता है मुझेप्रेमअकेले होने का हीएक और ढंग है।
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