EPISODE · May 17, 2024 · 1 MIN
Furniture | Anamika
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
फ़र्नीचर | अनामिकामैं उनको रोज़ झाड़ती हूँपर वे ही हैं इस पूरे घर मेंजो मुझको कभी नहीं झाड़ते!रात को जब सब सो जाते हैं—अपने इन बरफाते पाँवों परआयोडिन मलती हुई सोचती हूँ मैं—किसी जनम में मेरे प्रेमी रहे होंगे फ़र्नीचर,कठुआ गए होंगे किसी शाप से ये!मैं झाड़ने के बहाने जो छूती हूँ इनको,आँसुओं से या पसीने से लथपथ-इनकी गोदी में छुपाती हूँ सर-एक दिन फिर से जी उठेंगे ये!थोड़े-थोड़े-से तो जी भी उठे हैं।गई रात चूँ-चूँ-चू करते हैं :ये शायद इनका चिड़िया का जनम है,कभी आदमी भी हो जाएँगे!जब आदमी ये हो जाएँगे,मेरा रिश्ता इनसे हो जाएगा क्यावो ही वालाजो धूल से झाड़न का?
Embed this episode
NOW PLAYING
Furniture | Anamika
No transcript for this episode yet
Similar Episodes
No similar episodes found.