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Gaveshna | Aakash

EPISODE · Apr 15, 2025 · 2 MIN

Gaveshna | Aakash

from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio

गवेषणा | आकाश इस नुमाइश मे ईश्वर खोज रहा हूँ,बच्चों की मानिंद बौराया हुआ,इस दुकान से उस दुकान,उथली रौशनी की परिधि के भीतर,चमकीली भीड़ में घिरे,जहाँ केवल नीरसता और बीरानगी विद्यमान है।इस नुमाइश में,मैं अस्पष्ट अज्ञात लय में चलता हूँ, और घूमकर पाता हूँस्वयं को निहत्था, निराश और पराजित।छान आया हूँ आस्था की चार दीवारी,लाँघ लिए हैं प्रकाश के पर्वत,घूम लिया है ज्ञान की गुफ़ाओं में,कर ली है परिक्रमा बोध के वृक्षों की,और ढूँढ लिया है किताबों-कलाकृतियों में यहाँ तक अनका की पीठ पर बैठ,सातवें आसमान से किया है दृष्टिपात धरा का।किन्तु इस नुमाइश में,ब्रहम किसी ओट में लुका हुआ है,गोचर-अगोचर, जीवन-मृत्यू की सीमा से अत्यंत दूर।यदा-कदा मैं सोचता हूँ, कि इस नुमाइश में क्या होगा मृत्यूपरांत मेरा?तब विचार करने पर मैं पाता हूँ,मैं यहीं इन शब्दों में जीवित रहूँगाअपनी रचनाओं के भीतर साँस लेता रहूँगाठीक उसी तरह जैसे,साँस लेता है ईश्वर मेरे भीतर।

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Gaveshna | Aakash

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