EPISODE · Sep 13, 2025 · 2 MIN
Ghar Ki Ore | Naresh Mehta
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
घर की ओर | नरेश मेहता वह-जिसकी पीठ हमारी ओर हैअपने घर की ओर मुँह किये जा रहा हैजाने दो उसेअपने घर।हमारी ओर उसकी पीठ-ठीक ही तो हैमुँह यदि होतातो भी, हमारे लिए वहसिवाय एक अनाम व्यक्ति केऔर हो ही क्या सकता था?पर अपने घर-परिवार के लिए तोवह केवल मुँह नहींएक सम्भावनाओं वालीऐसी संज्ञाजिसके साथ सम्बन्धों का इतिहास होगाऔर होगी प्रतीक्षा करतीराग कीएक सम्पूर्ण भागवत-कथा।तभी तोवह-हाथ में तेल की शीशी,कन्धे की चादर मेंबच्चों के लिए चुरमुरागुड़ या मिठाईया अपनी मुनिया के लिए होगाकोई खिलौनाऔर निश्चित ही होगीबच्चों की माँ के लिए भी...(जाने दोउसकी इस व्यक्तिगत गोपनीयता की गाँठहमें नही खोलनी चाहिए।)वह जिस उत्सुकता और तेज़ी सेचल रहा हैतुम्हें नहीं लगता किएक दिन मेंवह पूरी पृथ्वी नाप सकता हैसूर्य की तरह?बशर्ते उस सिरे परसूर्य की ही तरहउसका भी घर होबच्चे हों औरइसलिए घर जाते हुए व्यक्ति मेंऔर सूर्य मेंकाफी कुछ समानता है।पुकारो नहीं-उसे जाने दोहमारी ओर पीठ होगीतभी न घर की ओर उसका मुँह होगा!सूर्य को पुकारा नहीं जाताउसे जाने दिया जाता है।
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