EPISODE · Jul 17, 2026 · 4 MIN
Jharkhand Ke Pahadon Ka Aranyarodan | Gyanendrapati
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
झारखण्ड के पहाड़ों का अरण्यरोदन । ज्ञानेन्द्रपतिडबडबा आया है भुरुकवापूरब में भिनसार का भान हैचिड़ियों का उजला कलरव जागने से पहलेअँधियारी में एक काली कराह की मद्धिम गूँज हैवह कौन हैइस नीरव झारखण्ड मेंअपने कलपने कोअपने भी कानों से दूरहिरदै की मुट्ठी में कसे हुए?वे छोटानागपुर के ठिगने पहाड़ हैंयहाँ के काले दुबले हड़ियल बूढ़ेआदिवासियों की तरह ही चुप्पा कठिननए दिन के लिए वे तैयार कर रहे हैं ख़ुद कोअब आएँगे पर्वतों के पंख काटने वाले वज्रधर इन्द्र के वंशजअपनी फटफटिया में भड़भड़िया मेंऔर फटाफट धड़ाधड़चालू हो जाएँगे क्रशरबारूद की गन्ध फैल जाएगी हवा मेंउनके टूटने की गन्ध के ऊपरऔर वे बोल्डरों में गिट्ठियों में खण्ड-खण्ड हो जाएँगेचौड़े पंजरों वाले ट्रकों के पेटटायरों की हवा तक भरते जाएँगे जल्दी-जल्दीऔर धीरे-धीरे चमक बढ़ती जाएगीउन चेहरों परजिनकी जेब में उन्हें तोड़ने का पट्टा है यानी एक मुहर लगा बेमतलब-सा पर मतलबी कागज़और ख़ुश जो मन ही मन कहेंगेआज ठर्रा नहीं, विलायती चलेगीएक नया दिनकि पुराना दिनहै इन प्राचीन पहाड़ों के सामनेतेज़ हवाओं में जिनकी ठोस काया में भीतर ही भीतरअभी भी बज उठता है मैग्मा-धरती का वह मूल द्रव्य-जलतरंग-साजिनकी आग्नेय चट्टानेंधरती की प्राचीनतम रचनाएँ हैंहिमालय के पर्वत-वलय जिनके बच्चे-बुतरूधुँधली आँखें उठाए नेह से निहारते हैं वे। भुकम्प-तरंगें छोड़ती एड़ियाँ उचका नभ में उठतेहिमालय के वर्फीले-गर्वीले शिखरों के युवमाथसत्तर करोड़ वर्षों का समय पसरा हुआ हैउनकी काली घिसी हुई देह मेंवे पर्वतकुल के आदि पुरुष हैंबस सात करोड़ वर्ष हुए हैं, इनके कुल-खुँट मेंउगी थी हिमालय की कोंपलविन्ध्याचल तब नाच-नाच उठा था मगन अरावली पर्वत-मालाओं ने गाए थे सोहरआशीष दिया था इन पठारों सेआदिपर्वतों नेये वही पुरखे पहाड़ हैं जिनके हाड़आज लालची मानव-गिद्धों का भोजन-भरपूरब मेंडबडबा आया है भुरुकवाकि जैसे वह छोटानागपुर के छीजते जंगलों, मिटती वनस्पतियों, खंखुरते खनिजों कीआँख होकि क्या धरा है भू मेंइन भूधरों की छाँह के गुज़र जाने के बादबस आतप और बिपत ।
What this episode covers
झारखण्ड के पहाड़ों का अरण्यरोदन । ज्ञानेन्द्रपतिडबडबा आया है भुरुकवापूरब में भिनसार का भान हैचिड़ियों का उजला कलरव जागने से पहलेअँधियारी में एक काली कराह की मद्धिम गूँज हैवह कौन हैइस नीरव झारखण्ड मेंअपने कलपने कोअपने भी कानों से दूरहिरदै की मुट्ठी में कसे हुए?वे छोटानागपुर के ठिगने पहाड़ हैंयहाँ के काले दुबले हड़ियल बूढ़ेआदिवासियों की तरह ही चुप्पा कठिननए दिन के लिए वे तैयार कर रहे हैं ख़ुद कोअब आएँगे पर्वतों के पंख काटने वाले वज्रधर इन्द्र के वंशजअपनी फटफटिया में भड़भड़िया मेंऔर फटाफट धड़ाधड़चालू हो जाएँगे क्रशरबारूद की गन्ध फैल जाएगी हवा मेंउनके टूटने की गन्ध के ऊपरऔर वे बोल्डरों में गिट्ठियों में खण्ड-खण्ड हो जाएँगेचौड़े पंजरों वाले ट्रकों के पेटटायरों की हवा तक भरते जाएँगे जल्दी-जल्दीऔर धीरे-धीरे चमक बढ़ती जाएगीउन चेहरों परजिनकी जेब में उन्हें तोड़ने का पट्टा है यानी एक मुहर लगा बेमतलब-सा पर मतलबी कागज़और ख़ुश जो मन ही मन कहेंगेआज ठर्रा नहीं, विलायती चलेगीएक नया दिनकि पुराना दिनहै इन प्राचीन पहाड़ों के सामनेतेज़ हवाओं में जिनकी ठोस काया में भीतर ही भीतरअभी भी बज उठता है मैग्मा-धरती का वह मूल द्रव्य-जलतरंग-साजिनकी आग्नेय चट्टानेंधरती की प्राचीनतम रचनाएँ हैंहिमालय के पर्वत-वलय जिनके बच्चे-बुतरूधुँधली आँखें उठाए नेह से निहारते हैं वे। भुकम्प-तरंगें छोड़ती एड़ियाँ उचका नभ में उठतेहिमालय के वर्फीले-गर्वीले शिखरों के युवमाथसत्तर करोड़ वर्षों का समय पसरा हुआ हैउनकी काली घिसी हुई देह मेंवे पर्वतकुल के आदि पुरुष हैंबस सात करोड़ वर्ष हुए हैं, इनके कुल-खुँट मेंउगी थी हिमालय की कोंपलविन्ध्याचल तब नाच-नाच उठा था मगन अरावली पर्वत-मालाओं ने गाए थे सोहरआशीष दिया था इन पठारों सेआदिपर्वतों नेये वही पुरखे पहाड़ हैं जिनके हाड़आज लालची मानव-गिद्धों का भोजन-भरपूरब मेंडबडबा आया है भुरुकवाकि जैसे वह छोटानागपुर के छीजते जंगलों, मिटती वनस्पतियों, खंखुरते खनिजों कीआँख होकि क्या धरा है भू मेंइन भूधरों की छाँह के गुज़र जाने के बादबस आतप और बिपत ।
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Jharkhand Ke Pahadon Ka Aranyarodan | Gyanendrapati
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