EPISODE · Feb 7, 2025 · 4 MIN
Kathariyan | Ekta Verma
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
कथरियाँ | एकता वर्मा कथरियाँगृहस्थियों के उत्सव-गीत होती हैं।जेठ-वैसाख के सूखे हल्के दिनों मेंसालों से संजोये गए चीथड़ों को क़रीने से सजाकरऔरतें बुनती हैं उनकी रंग-बिरंगी धुन।वे धूप की कतरनों पर फैलती हैंतो उठती है, हल्दी और सरसों के तेल की पुरानी सी गंध।गौने में आयी उचटे रंग की साड़ियाँबिछ जाती हैं महुए की ललायी कोपलों की तरहजड़ों की स्मृतियों पर।युगों पुरानी कथरियाँ इतरा उठती हैं, नये लिबास में।कानों तक मोटे सूती धागे की तान उठती है।आलापों के सीधे-आड़े टप्पे पड़ते हैं लकीरों में।औरत के हाथ थिरकते हैं।पृथ्वी पर उभरती हैं अक्षांश और देशांतर।(हतभाग्य! वे भी काल्पनिक कहलायी)घर की औरतें, भरी दोपहरी मेंइन्हे धूप दिखाती हैं,लेसती-रोपती हैंरफू रौगन करती हैं हर सालइस तरह वो अपना इतिहास बचाती हैंपुरुषों के वंश लिखे जाते हैंहरिद्वार में, पंडों के पत्तरों मेंऔरतों की पुरखिनें दर्ज होती हैंघर की इन्हीं पुरानी कथरियों में।ये कथरियाँमानव त्रासदियों की चश्मदीद हैं,इन्होंने, इतिहास को सबसे नंगे क्षणों में हाफते देखा है!उसके धब्बों में मर्सिया के आंसू सोखे हुए हैंसलवटों में प्रार्थनाओं की ख़ाली सीपियाँ दबी हैं,चटखती हैं रात बे-रात करवटों पर।इनमें टॅंके हैं प्यार के नर्म क़िस्से भीकिरोसिया की चद्दर में कढ़े गुलाब की तरह, यहाँ- वहाँ।रातों में फुसफुसाकर कही गई मुहब्बत की मीठी शायरियाँलाड़ में पागे गये बोसे और मनुहारों पररीझी थी कथरियाँ भी, बिदा होकर आयी नई-नवेली दुलहिनों के साथ-साथकथरियाँ ही जानती हैं,दिन में मूँछों के नीचे दबे रहे होंठ सबके सो जाने पर मुस्कुराते है,तब;चाँद उतरकर चारपाई की पाटी तक अता है।ये कथरियाँ कुशल परिचायिकाएँ भी रही,औरतों की सूजी हुई पीठों परधरती रही गर्म फाहे ताउम्र।कथरियों ने भूगोल भी जानावे बताती हैं, औरतों ने खारे समंदरों को अपनी पीठ पर सुखाया है।कथरी का सूखा हुआ कोना(जहां वे आदम को थपक-थपककर सुलाती हैं,)पृथ्वी का एक चौथाई थल है।जिसे किन्ही नाविकों ने नहीऔरतों ने अपनी हथेलियों से टटोलकर ढूँढा है।कथरियों के पास पृथ्वी के अपने मानचित्र हैं।यदि कोई पुरातत्वविद इनका धागा उतके,तो मिलेगाउनका ससुरा, मैका, पाषाण-पुरापाषाण सब।जादुई क़ालीनों की तरह वे ले जाएँगीइतिहास के चिन्हित युगों के और पीछे!पूजागृह के लाल कपड़े में लपेटी किताब की तरहऔरतों को फ़ुरसत की जिल्द न जुरी।घोंसला बुनती बुलबुल की तरह वे गाती ही रहीं बुनती-बिछाती ही रहीं ।इसलिए समय से होड़ मेंमैके की कच्ची दीवार पर छूटी हथेलियों की लाल छाप की तरह,नाम की जगह वे बचा पायी हथेलियाँऔर कविता की जगह कथरियाँ!
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