EPISODE · Jan 16, 2024 · 2 MIN
Kavita | Damodar Khadse
from Pratidin Ek Kavita · host Nayi Dhara Radio
कविता | दामोदर खड़सेसमयजब कहींगिरवी हो जाता हैसाँसें तबकितनी भारी हो जाती हैंआसपास दिखता नहीं कुछ भीकेवल देह दौड़ती हैबरसाती बादलों की तरह हाँफना भी भुला देती है थकान!ऐसे में तब तुमकविता की ताबीजबाँहों पर बाँध लेना!एक गुनगुनाहट छोटे-छोटे छंदों कीफुसफुसाहटशब्दों की दस्तक और अपनी आहटभीतर ही भीतर पा लेना!कविता,अँधेरी रातों कोचुभती विसंगत बातों कोदेगी एक संदेशऔर रह-रहकर टूटता समयएक लड़ी बनकरकभी सीढ़ी बनकरतुम्हारे सामने जगमगाएगादेखते-देखते हर गिरवी पल तुम्हारा अपना हो जाएगा...कविता का ओर-छोर तुम अपने हाथों मेंजगाए रखना...!
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Kavita | Damodar Khadse
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